फादर्स डे स्पेशल:पिता-पुत्र की वकील जोड़ी बनी मिसाल, बेटा दिला रहा इंसाफ

प्रवीण श्रीवास्तव, भोपाल। 20 वर्षों से वकालत कर रहे राजेश सक्सेना के साथ उनके पुत्र सारांश सक्सेना पिछले तीन वर्षों से कानून की दुनिया में सक्रिय हैं। दोनों का मानना है कि वकालत केवल पेशा नहीं, बल्कि न्याय और सच के पक्ष में खड़े होने की जिम्मेदारी है।
चैंबर में पिता-पुत्र का अनोखा रिश्ता
हाईकोर्ट के चैंबर में रोज फाइलों पर चर्चा होती है और मुकदमों की रणनीति बनाई जाती है। यहां एक मेज के दोनों ओर बैठे राजेश सक्सेना और सारांश सक्सेना केवल वकील नहीं, बल्कि पिता और पुत्र भी हैं। कभी पिता को काला कोट पहनकर अदालत जाते देखने वाला बेटा आज उन्हीं के साथ बैठकर मुकदमों की तैयारी करता है। अदालत के भीतर उनकी पहचान एक सफल वकील जोड़ी के रूप में है।
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पहले केस में मिला अनुभव काम आया
सारांश सक्सेना के करियर का पहला बड़ा मामला एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ा था, जिसे कथित रूप से गलत साक्ष्यों के आधार पर जेल भेज दिया गया था। मामले की फाइल लेकर जब वह पिता के पास पहुंचे तो राजेश सक्सेना ने उन्हें कानूनी धाराओं के साथ जिरह की बारीकियां भी समझाईं। सारांश ने हर तथ्य और दस्तावेज का गहराई से अध्ययन किया और अदालत में मजबूती से पक्ष रखा। इस मामले में मिली सफलता ने उनके आत्मविश्वास को नई दिशा दी।
17 किसानों की लड़ाई बनी यादगार मुकदमा
पिता-पुत्र की जोड़ी के लिए 17 किसानों का मामला सबसे यादगार मुकदमों में से एक रहा। किसानों ने एक बड़ी कंपनी से बीज खरीदे थे, लेकिन कथित रूप से बीज नकली निकलने से उनकी फसल बर्बाद हो गई थी। दूसरी ओर कंपनी ने अपने पक्ष में 10 से अधिक वकीलों की टीम उतार दी थी। अनुभव और नई सोच के मेल से दोनों ने किसानों के पक्ष में मजबूती से दलीलें रखीं और आखिरकार फैसला किसानों के पक्ष में आया।
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'सच कभी नहीं हारता' बना जीवन का मंत्र
सारांश बताते हैं कि वकालत शुरू करने से पहले पिता ने उन्हें एक ही सीख दी थी हमेशा सच का साथ दो, क्योंकि सच कभी नहीं हारता। आज भी किसी नए मामले की तैयारी करते समय वह इसी बात को याद रखते हैं। वहीं राजेश सक्सेना मानते हैं कि नई पीढ़ी कानून और तकनीक के बदलते स्वरूप को बेहतर समझती है। यही वजह है कि चैंबर में सीखने की प्रक्रिया दोनों दिशाओं में चलती रहती है।












