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MP High Court:स्टॉप पेमेंट के निर्देश नहीं हैं तो चेक बाउंस नहीं कर सकता बैंक, BOI की अपील खारिज

हाईकोर्ट ने एक बड़े फैसले में बैंकों के लिए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। अब बैंक ग्राहक द्वारा स्टॉप पेमेंट के निर्देश न होने पर किसी चेक को बाउंस नहीं कर सकते।
स्टॉप पेमेंट के निर्देश नहीं हैं तो चेक बाउंस नहीं कर सकता बैंक, BOI की अपील खारिज

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बैंकिंग सेवाओं से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि खाताधारक की ओर से ‘स्टॉप पेमेंट’ का कोई निर्देश नहीं दिया गया है तो बैंक किसी वैध चेक का भुगतान रोककर उसे बाउंस नहीं कर सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि खाते के स्वरूप या टाइटल में बदलाव को चेक अस्वीकार करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

बैंक ऑफ इंडिया की अपील खारिज

एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने यह फैसला सुनाते हुए बैंक ऑफ इंडिया की अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि यदि कोई पार्टनरशिप फर्म बाद में प्रोपराइटरशिप फर्म में बदल जाती है तो केवल खाते का टाइटल बदल जाने के आधार पर पहले से जारी वैध चेक को अस्वीकार नहीं किया जा सकता।

क्या था पूरा मामला?

मामला करीब दो दशक पुराना है। मैसर्स डागा कॉमर्स, जो पहले एक पार्टनरशिप फर्म थी, के गिरधर डागा ने 15 अप्रैल 2003 को एक-एक लाख रुपये के दो चेक जारी किए थे। जब चेक भुगतान के लिए बैंक में प्रस्तुत किए गए तो बैंक ने यह कहते हुए उन्हें लौटा दिया कि खाते का टाइटल संशोधित हो चुका है। इसके बाद चेक प्राप्तकर्ता आर.के. श्रीवास्तव ने बैंकिंग लोकपाल के समक्ष शिकायत दर्ज कराई।

लोकपाल का फैसला बदला, फिर पहुंचा मामला हाईकोर्ट

शुरुआत में बैंकिंग लोकपाल ने शिकायतकर्ता के पक्ष में फैसला दिया था लेकिन बाद में बैंक की पुनर्विचार याचिका पर अपने ही आदेश को बदल दिया। इसके बाद आर.के. श्रीवास्तव ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 12 फरवरी 2026 को हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने बैंक को दोषी मानते हुए शिकायतकर्ता को मुआवजा देने का आदेश दिया था। इसी आदेश को चुनौती देते हुए बैंक ने डिवीजन बेंच में रिट अपील दायर की थी।

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हाईकोर्ट ने बैंक की दलील नहीं मानी

सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि बैंक ने खाते का स्वरूप बदलते समय खाताधारक से पुरानी चेक बुक वापस नहीं ली थी और न ही पुराने चेकों को रद्द किया था। अदालत ने कहा कि जब खाताधारक ने भुगतान रोकने संबंधी कोई निर्देश नहीं दिया था, तब बैंक के पास चेक का भुगतान रोकने का कोई वैध आधार नहीं था।

चेक लेकर आने वाला भी बैंक की सेवा का उपभोक्ता

डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा कि वैध चेक लेकर बैंक पहुंचने वाला प्रत्येक व्यक्ति बैंकिंग सेवा का उपभोक्ता माना जाएगा। ऐसे में बैंक की जिम्मेदारी है कि वह नियमों के अनुरूप भुगतान सुनिश्चित करे। अदालत ने माना कि खाते का टाइटल बदलना बैंक को चेक अस्वीकार करने का अधिकार नहीं देता, खासकर तब जब चेक वैध हो और खाताधारक की ओर से कोई रोक संबंधी निर्देश जारी न किए गए हों।

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मुआवजा देने का आदेश बरकरार

हाईकोर्ट ने बैंक ऑफ इंडिया की अपील को खारिज करते हुए सिंगल बेंच के फैसले को बरकरार रखा है। इसके तहत आर.के. श्रीवास्तव को चेक की राशि के साथ ब्याज सहित मुआवजा देने का आदेश यथावत रहेगा। यह फैसला बैंकिंग क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे चेक भुगतान और खातों में बदलाव से जुड़े मामलों में बैंकों की जिम्मेदारी और अधिक स्पष्ट हो गई है।

Sumit  Shrivastava
By Sumit Shrivastava

सुमित श्रीवास्तव एक अनुभवी मीडिया प्रोफेशनल, बिजनेस पत्रकार और शोधकर्ता हैं। मास कम्युनिकेशन में M.P...Read More

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