फादर्स डे स्पेशल:किडनी फेलियर से जूझ रहे बेटे-बेटियों के लिए बने जीवनदाता, अंगदान में पिता का ऐसा त्याग आज भी दुर्लभ

प्रवीण श्रीवास्तव, भोपाल। फादर्स डे पर जब पिता के प्रेम, त्याग और समर्पण की बातें होती हैं तब कुछ कहानियां ऐसी भी सामने आती हैं जो इस रिश्ते को शब्दों से कहीं आगे ले जाती हैं। ये उन पिताओं की कहानियां हैं जिन्होंने अपने बच्चों के सपनों को ही नहीं बल्कि उनकी जिंदगी को भी बचाने के लिए अपने शरीर का एक हिस्सा दान कर दिया। किडनी फेलियर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे बेटे-बेटियों के लिए इन पिताओं ने वह फैसला लिया, जिसे किसी भी माता-पिता के प्रेम की सबसे बड़ी मिसाल माना जाता है। ऑपरेशन थिएटर के बाहर जहां पूरा परिवार चिंता में डूबा था वहीं इन पिताओं ने बिना किसी हिचक के अपनी किडनी दान करने का निर्णय लिया ताकि उनके बच्चे फिर से सामान्य जिंदगी जी सकें। विशेषज्ञों के अनुसार अंगदान के मामलों में आमतौर पर महिलाओं, खासकर माताओं की संख्या अधिक देखने को मिलती है। पिता द्वारा संतान को किडनी दान करने के मामले अपेक्षाकृत कम सामने आते हैं। इसके बावजूद कई ऐसे पिता हैं जिन्होंने बीमारी के सामने हार मानने के बजाय अपने बच्चों को नई जिंदगी देने का फैसला किया। डायलिसिस, अस्पतालों के लगातार चक्कर और भविष्य की अनिश्चितताओं के बीच इन परिवारों के लिए किडनी ट्रांसप्लांट उम्मीद की नई किरण बनकर आया। फादर्स डे पर ये कहानियां बताती हैं कि पिता का प्यार सिर्फ जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं होता, जरूरत पड़ने पर वह अपनी जिंदगी का हिस्सा भी संतान को सौंप देता है।
बेटी की मुस्कान लौटी तो लगा जिंदगी दोबारा मिल गई
जब 17 वर्षीय अनुष्का वर्मा को पता चला कि उसकी दोनों किडनियां गंभीर रूप से प्रभावित हो चुकी हैं तो पूरा परिवार सदमे में आ गया। सप्ताह में कई बार डायलिसिस के लिए अस्पताल जाना पड़ता था। पढ़ाई प्रभावित हो रही थी और भविष्य को लेकर चिंता बढ़ती जा रही थी। डॉक्टरों ने स्पष्ट कर दिया कि स्थायी समाधान केवल किडनी ट्रांसप्लांट ही है। परिवार के कई सदस्यों की जांच की गई लेकिन सबसे उपयुक्त डोनर उसके पिता राजेश वर्मा निकले। राजेश वर्मा ने बिना किसी देरी के अपनी बेटी को किडनी दान करने का फैसला कर लिया। सफल ट्रांसप्लांट के बाद अनुष्का की सेहत में तेजी से सुधार हुआ। कुछ ही महीनों में उसने फिर से स्कूल जाना शुरू कर दिया, दोस्तों से मिलना-जुलना बढ़ गया और चेहरे पर पुरानी मुस्कान लौट आई। राजेश वर्मा कहते हैं ऑपरेशन के बाद जब मैंने अपनी बेटी को फिर से स्वस्थ होकर चलते और मुस्कुराते देखा, तो लगा जैसे मुझे भी जिंदगी दोबारा मिल गई हो। यह कोई त्याग नहीं था बल्कि पिता होने का सबसे बड़ा सौभाग्य था।
बेटे को बचाने के लिए खुद ऑपरेशन टेबल पर पहुंचे पिता
22 वर्षीय आदित्य शर्मा लंबे समय से गंभीर किडनी बीमारी से जूझ रहे थे। उनका जीवन पूरी तरह डायलिसिस पर निर्भर हो गया था। लगातार इलाज और अस्पतालों के चक्कर ने परिवार को मानसिक और आर्थिक दोनों रूप से प्रभावित किया। कई बार ऐसा लगा कि इलाज की राह मुश्किल होती जा रही है लेकिन पिता महेश शर्मा ने उम्मीद नहीं छोड़ी। जांच के दौरान पता चला कि उनकी किडनी बेटे के लिए उपयुक्त है। उम्र बढ़ने और ऑपरेशन से जुड़े जोखिमों के बावजूद महेश शर्मा ने तुरंत सहमति दे दी। ट्रांसप्लांट सफल रहा और आदित्य की सेहत में तेजी से सुधार आने लगा। जो युवक पहले अपना अधिकांश समय अस्पताल में बिताता था, वह अब अपने करियर और भविष्य की नई योजनाओं पर काम कर रहा है। महेश शर्मा कहते हैं मैंने कभी इसे बलिदान नहीं माना। अगर मेरे शरीर का एक हिस्सा मेरे बेटे को सामान्य जीवन दे सकता है, तो इससे बड़ी खुशी मेरे लिए कोई नहीं हो सकती।
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डायलिसिस के दर्द से जूझ रही बेटी के लिए पिता बने उम्मीद की किरण
नेहा तिवारी की बिगड़ती सेहत ने पूरे परिवार को चिंता में डाल दिया था। किडनी फेलियर के कारण उसे बार-बार अस्पताल में भर्ती होना पड़ता था और नियमित डायलिसिस उसकी जिंदगी का हिस्सा बन गया था। पिता संजय तिवारी हर डायलिसिस सत्र में उसके साथ बैठते, उसे हिम्मत देते और भरोसा दिलाते कि सब ठीक हो जाएगा। जब डॉक्टरों ने बताया कि उनकी किडनी नेहा के लिए उपयुक्त हो सकती है तो संजय तिवारी ने बिना किसी हिचकिचाहट के अंगदान का निर्णय ले लिया। सफल ट्रांसप्लांट के बाद नेहा की जिंदगी पूरी तरह बदल गई। वह अब सामान्य दिनचर्या की ओर लौट चुकी है और अपने भविष्य की योजनाएं बनाने लगी है। संजय तिवारी कहते हैं बीमारी के दिनों में सबसे ज्यादा दर्द अपनी बेटी को कमजोर होते देखने का था। ऑपरेशन के बाद जब उसने फिर से सामान्य जिंदगी जीना शुरू किया तो वही पल मेरे लिए सबसे बड़ा उपहार बन गया।
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जब पिता का प्यार बन गया जीवनदान
इन तीनों कहानियों में परिस्थितियां अलग-अलग हैं लेकिन एक बात समान है अपने बच्चों के लिए पिता का निस्वार्थ प्रेम। इन पिताओं ने साबित किया कि पिता सिर्फ परिवार का सहारा नहीं होता बल्कि जरूरत पड़ने पर वह अपने बच्चे की जिंदगी बचाने के लिए खुद को भी दांव पर लगा सकता है। फादर्स डे पर ये प्रेरक कहानियां बताती हैं कि पिता की ममता भले कम दिखाई देती हो लेकिन जब संतान पर संकट आता है तो वही पिता उसकी सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ा रक्षक बनकर सामने खड़ा होता है।












