फर्जी जाति प्रमाण पत्र पर 32 साल नौकरी,नहीं मिलेगी पेंशन; हाईकोर्ट से याचिका खारिज

जबलपुर। उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के मूल निवासी अपीलार्थी के जाति प्रमाण पत्र को उच्च स्तरीय छानबीन समिति पहले ही अवैध घोषित कर चुकी थी। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने एकल पीठ के फैसले को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी।
जाति प्रमाण पत्र को समिति ने बताया अवैध
अपीलार्थी ने उत्तर प्रदेश के तहसीलदार द्वारा जारी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति (एससी) श्रेणी के तहत लेक्चरर की नौकरी हासिल की थी। 15 फरवरी 2017 को उसके जाति प्रमाण पत्र की वैधता पर सवाल उठे और 24 सितंबर 2019 को उच्च स्तरीय छानबीन समिति ने प्रमाण पत्र को पूरी तरह अवैध घोषित कर दिया।
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32 साल की सेवा के बाद हुआ था रिटायर
प्रमाण पत्र के खिलाफ कार्रवाई के बाद अपीलार्थी ने 2020 में रिट याचिका दायर की थी, लेकिन उसे कोई अंतरिम सुरक्षा नहीं मिली। इसी दौरान उसने अपनी सेवा पूरी की और 28 फरवरी 2023 को रिटायर हो गया, जिसके बाद उसने पेंशन के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
एकल पीठ के फैसले के खिलाफ की अपील
पेंशन का दावा पहले ही एकल पीठ द्वारा खारिज किया जा चुका था। इसके बाद अपीलार्थी ने खंडपीठ के सामने अपील की, लेकिन खंडपीठ ने भी एकल पीठ के फैसले को पूरी तरह सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी और कहा कि बिना वैध आधार के मिले लाभ के आधार पर सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन का दावा नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला
अपीलार्थी की ओर से सुप्रीम कोर्ट के शिरीष पंढरीनाथ पाटिल मामले का उदाहरण दिया गया था। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि उस मामले के तथ्य अलग थे और मौजूदा मामले में उसका लाभ नहीं दिया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने पाटिल मामले में Article 142 के तहत 30 साल से अधिक की सेवा के बाद सीमित रूप से पेंशन और रिटायरमेंट लाभों की सुरक्षा दी थी।
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अंतरिम संरक्षण नहीं मिलने को भी माना अहम
हाईकोर्ट ने पाया कि याचिका लंबित रहने के दौरान नौकरी बचाने के लिए अपीलार्थी को कोई स्टे या अंतरिम संरक्षण नहीं मिला था। अदालत ने इसी आधार पर यह भी माना कि वह ऐसी सुरक्षा का लाभ नहीं पा सकता और फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी का अनुचित लाभ लेने के बाद सेवानिवृत्ति पर पेंशन का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।




















