क्यूबा के आसपास अचानक बढ़ी अमेरिकी गतिविधियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल पैदा कर दी है। अमेरिकी नौसेना का एडवांस्ड सर्विलांस ड्रोन MQ-4C ट्राइटन करीब छह घंटे तक क्यूबा के दक्षिणी तट के ऊपर चक्कर लगाता रहा। इस दौरान उसने न सिर्फ समुद्री इलाकों बल्कि अहम शहरों के आसपास भी निगरानी की। यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय पर हुआ है जब अमेरिका और क्यूबा के रिश्तों में पहले से ही तनाव बना हुआ है। फ्लाइट ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक यह ड्रोन अमेरिका के जैक्सनविले बेस से उड़ान भरकर क्यूबा पहुंचा और वहां लंबा मिशन पूरा करने के बाद वापस लौट गया। इस तरह की गतिविधि को सामान्य नहीं माना जा रहा, क्योंकि आमतौर पर यह ड्रोन युद्ध या संवेदनशील क्षेत्रों में ही तैनात किया जाता है।
ड्रोन ने क्यूबा के दक्षिणी तट की पूरी लंबाई को स्कैन किया। रिपोर्ट्स के अनुसार यह सैंटियागो डी क्यूबा के पास करीब दो घंटे तक मंडराता रहा। इसके बाद यह राजधानी हवाना के आसपास भी करीब दो घंटे तक चक्कर लगाता रहा। इतनी लंबी और करीब से की गई निगरानी ने सुरक्षा विशेषज्ञों को चौंका दिया है। फ्लाइट ट्रैकर्स का कहना है कि इससे पहले इस ड्रोन को क्यूबा के इतने करीब कभी नहीं देखा गया था। यही वजह है कि इस मिशन के समय और रूट को बेहद अहम माना जा रहा है।
MQ-4C ट्राइटन अमेरिकी नौसेना का सबसे आधुनिक ड्रोन माना जाता है। इसकी कीमत करीब 2000 करोड़ रुपये बताई जाती है। यह ड्रोन बहुत ऊंचाई पर उड़ान भर सकता है और कई घंटों तक लगातार हवा में रह सकता है। इसमें लगे रडार, हाई-रिजोल्यूशन कैमरे और इलेक्ट्रॉनिक सेंसर जमीन और समुद्र की हर गतिविधि पर नजर रख सकते हैं। बड़े इलाके की एक साथ निगरानी करने की इसकी क्षमता इसे खास बनाती है। यही वजह है कि इसे रणनीतिक मिशनों में इस्तेमाल किया जाता है।
ये भी पढ़ें: होर्मुज फिर बंद: ईरान ने लिया यू-टर्न, 24 घंटे तक भी नहीं खुल सका स्ट्रेट
इस पूरे घटनाक्रम को और ज्यादा गंभीर बनाने वाला पहलू है डोनाल्ड ट्रंप का हालिया बयान। ट्रंप ने हाल ही में कहा था कि उन्हें क्यूबा को किसी न किसी रूप में लेने का सम्मान मिलेगा। इस बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल बढ़ गई थी। अब ड्रोन की यह लंबी उड़ान उसी बयान से जोड़कर देखी जा रही है। माना जा रहा है कि अमेरिका क्यूबा पर अपनी रणनीति को धीरे-धीरे आगे बढ़ा रहा है।
पेंटागन की गतिविधियां भी इस समय चर्चा में हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार क्यूबा को लेकर चुपचाप तैयारियां तेज हो रही हैं। अमेरिका ने क्यूबा की तेल आपूर्ति पर भी असर डाला है, जिससे वहां की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है। इसके अलावा, कई सालों बाद एक अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का हवाना पहुंचना भी संकेत देता है कि पर्दे के पीछे कई स्तरों पर काम चल रहा है। इन सब घटनाओं को जोड़कर देखा जाए तो तस्वीर काफी संवेदनशील नजर आती है।
[breaking type="Breaking"]
इस मामले में सबसे ज्यादा चर्चा उस पुराने घटनाक्रम की हो रही है जब यही ड्रोन वेनेजुएला के पास उड़ान भरता देखा गया था। उस समय भी इसने करीब 10 घंटे तक निगरानी की थी। इसके कुछ महीनों बाद अमेरिका ने काराकास में कार्रवाई की और निकोलस मादुरो को निशाने पर लिया गया। अब क्यूबा के ऊपर उसी तरह का मिशन देखने के बाद कई विशेषज्ञ इसे वेनेजुएला पैटर्न बता रहे हैं। उनका मानना है कि अमेरिका पहले निगरानी बढ़ाता है और फिर किसी बड़े कदम की तैयारी करता है।
क्यूबा लंबे समय से अमेरिका की विदेश नीति में एक अहम मुद्दा रहा है। दोनों देशों के बीच दशकों से राजनीतिक और वैचारिक मतभेद रहे हैं। अमेरिका क्यूबा की कम्युनिस्ट सरकार पर लगातार दबाव बनाता रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका क्यूबा में बदलाव चाहता है, जबकि क्यूबा इसे अपने आंतरिक मामलों में दखल मानता है। यही टकराव समय-समय पर तनाव को बढ़ाता रहता है।