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Bhopal AIIMS में दुर्लभ सफाई :लंग्स पर जम गई थी धूल, आठ लीटर सलाइन वाटर से फेफड़ों को धोकर बचाई जान

भोपाल AIIMS में सिलिकोसिस से जूझ रहे मरीज का दुर्लभ तकनीक से  उपचार किया गया। इस बीमारी में फेफड़े पत्थर जैसे कड़क हो जाते हैं। मरीज का सांस लेना हो जाता है मुश्किल। मध्यभारत में यह पहली बार है जब फेफड़ों पर जमी धूल को पानी से साफ किया गया।
लंग्स पर जम गई थी धूल, आठ लीटर सलाइन वाटर से फेफड़ों को धोकर बचाई जान
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    भोपाल। पत्थरों की चमक के पीछे हजारों मजदूरों की जिंदगी को निगलने वाली एक खामोश बीमारी सिलिकोसिस भी छुपी होती है। यह एक ऐसी बीमारी है, जिसका कोई स्थायी इलाज नहीं है। इसमें फेफड़े पत्थर जैसे सख्त हो जाते है और मरीजों को सांस लेना तक मुश्किल हो जाता है। ऐसा ही एक मरीज गंभीर हालत में AIIMS भोपाल पहुंचा। उसे सांस लेने में परेशानी हो रही थी। जांच के दौरान पता चला कि मरीज के दोनों फेफड़ों में एक खास तरह का प्रोटीन जमा था, जिससे फेफड़े भी सख्त हो गए थे। मरीज की स्थिति ऐसी थी कि अगल जल्द उपचार नहीं किया जाता तो उसकी मौत भी हो सकती थी। ऐसे में AIIMS में होल लंग्स लैवेज प्रक्रिया को अपनाकर सलाइन वाटर से फेफड़ों को धोकर प्रोटीन को साफ किया। AIIMS प्रबंधन की मानें तो मध्य भारत में पहला मौका है जब लंग्स पर जमे प्रोटीन को पानी से धोकर साफ किया हो। 

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    बेहद जटिल है प्रक्रिया, 6 घंटे लगा समय

    इस पूरी प्रकिया को एम्स के पल्मोनोलॉजी विभाग के प्रो डॉ. अल्केश खुराना और असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अभिनव खुराना द्वारा संपन्न किया गया। डॉ. खुराना के मुताबिक मरीज स्टोन क्रशर में काम करता था, जिससे वहां उड़ने वाली धूल उसके फेफड़ों में जम गई थी। इसे डिफ्यूज एल्जियोविर प्रोटिनोसिस भी कहते हैं। उन्होंने बताया कि इसके लिए एंजियोग्राफी के दौरान सलाइन वाटर से फेफड़े को साफ किया गया। यह प्रक्रिया बहुत जटिल होती है, क्योंकि फेफड़े में 6 से 8 लीटर पानी डालने से मरीज की मौत भी हो सकती है। इसलिए करीब 6 घंटे में पूरी प्रकिया हो सकी।

    कार्डियक ओटी में किया गया ऑपरेशन

    इस प्रोसीजर में कार्डियक थोरेसिक सर्जन डॉ. योगेश निवारिया भी शामिल थे। उन्होंने बताया कि यह प्रक्रिया इसलिए कठिन है क्योंकि एक फेफड़े को साफ करने के दौरान मरीज दूसरे फेफड़े पर ही निर्भर रहता है। इस मरीज का दूसरा फेफड़ा भी पूरी तरह से कमजोर था। ऐसे में मरीज को हार्ट लंग्स मशीन (आर्टिफिशियल लंग्स) पर रखना पड़ सकता है। हालांकि इस मरीज को इसकी जरूरत नहीं पड़ी।

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    कैसे होती है सिलिकोसिस

    सिलिका नामक बहुत बारीक धूल के कण सांस के साथ फेफड़ों में पहुंच जाते हैं और वहां जमा होकर फेफड़ों की कोमल झिल्लियों को नष्ट कर देते हैं। इससे फेफड़े स्पंज जैसे न रहकर पत्थर की तरह कठोर हो जाते हैं।  सांस लेना मुश्किल होता जाता है और अंत में ऑक्सीजन की कमी से मौत हो जाती है। ज्यादातर मरीज खदानों, स्टोन क्रशर, पत्थर की पाउडर मिलों, सीमेंट फैक्ट्री, कांच-सिरेमिक उद्योग में काम करने वाले गरीब मजदूर ही होते हैं। 

    Naresh Bhagoria
    By Naresh Bhagoria

    नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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