शाहिद खान, भोपाल। राजधानी समेत देशभर में ई-रिक्शा आम लोगों के लिए सस्ते और आसान परिवहन का साधन बन चुके हैं, लेकिन इनकी बढ़ती संख्या के साथ सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल भी खड़े हो रहे हैं। सड़कों पर दौड़ रहे अधिकांश ई-रिक्शा किसी भी तय मानक, टेस्टिंग या सरकारी सर्टिफिकेशन पर खरे नहीं उतरते। लोकल कारखानों और फैब्रिकेशन वर्कशॉप्स में तैयार हो रहे ये ई-रिक्शा यात्रियों की जान को जोखिम में डाल रहे हैं।
आरटीओ से मिली जानकारी के अनुसार भोपाल में 9 हजार से ज्यादा ई-रिक्शा पंजीकृत हैं, जबकि लगभग इतने ही बिना रजिस्ट्रेशन के चल रहे हैं। गोविंदपुरा, मंडीदीप और शहर के कई इलाकों में स्थित करीब 7 लोकल फैब्रिकेशन वर्कशॉप्स में ई-रिक्शा की चेसिस और बॉडी तैयार की जा रही है। इन वाहनों का कोई सुरक्षा टेस्ट नहीं होता है।
न्यू मार्केट से एमपी नगर तक इसमें रोजाना सफर करने वाली रेखा बाई कहती हैं, किराया कम है इसलिए ई-रिक्शा में बैठ जाते हैं, लेकिन कई बार लगता है कि गाड़ी पलट न जाए। ब्रेक लगाते ही झटका लगता है और बैटरी से अजीब आवाजें आती हैं। स्टेशन इलाके में ई-रिक्शा से यात्रा करने वाले रमेश यादव का कहना है कि क्षमता से ज्यादा सवारी बैठाने के कारण सफर और खतरनाक हो जाता है। मोड़ पर रिक्शा एक तरफ झुक जाता है, डर लगता है कि कहीं पलट न जाए।
यात्री ही नहीं, बल्कि शहर की ट्रैफिक व्यवस्था भी इन गैर-मानक ई-रिक्शा से प्रभावित हो रही है। टीटी नगर क्षेत्र में काम करने वाले निजी कर्मचारी इमरान खान बताते हैं, सड़कों पर ई-रिक्शा बेतरतीब खड़े रहते हैं, इनका कोई तय रूट नहीं है। ट्रैफिक पुलिस की सख्ती कभी-कभार ही दिखाई देती है।
31 जनवरी को करोंद इलाके में ई-रिक्शा की कमजोर बनावट सामने आ गई। करोंद आरओबी के सामने आलम अस्पताल के पास एक ई-रिक्शा को ट्रैक्टर ने हल्की टक्कर मार दी। इसके बावजूद ई-रिक्शा के परखच्चे उड़ गए, जिससे उसकी संरचनात्मक मजबूती पर गंभीर सवाल खड़े हो गए। हादसे के समय ई-रिक्शा में एक ही परिवार के तीन लोग सवार थे। टक्कर लगते ही ई-रिक्शा की चेसिस और बॉडी बुरी तरह मुड़ गई, जिसके कारण उसमें बैठे एक युवक का पैर घुटने के पास से टूट गया। हादसा इतना गंभीर था कि युवक की हड्डियां टूटकर बाहर निकल आईं।
केंद्र सरकार ने अप्रैल 2026 से सभी ई-रिक्शा निर्माण और असेंबली यूनिट का ऑडिट अनिवार्य करने की तैयारी है। ई-रिक्शा के लिए भी सेफ्टी रेटिंग सिस्टम लागू करने पर विचार किया जा रहा है। अप्रैल 2027 के बाद लिथियम-आयन बैटरी अनिवार्य करने और ई-रिक्शा की अधिकतम गति 25 किमी प्रति घंटा तय करने का प्रस्ताव भी है।
भारत में किसी भी तीन-पहिया या चार-पहिया वाहन के सड़क पर उतारने से पहले मजबूती, ब्रेकिंग सिस्टम, लाइटिंग, वजन, संरचना और इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए बैटरी सुरक्षा जैसे कई अहम परीक्षण शामिल होते हैं। इन सभी टेस्ट में पास होने के बाद ही टाइप अप्रूवल सर्टिफिकेट जारी किया जाता है। लेकिन भोपाल में चल रहे अधिकांश लोकल-निर्मित ई-रिक्शा इन प्रक्रियाओं से गुजरे बिना ही सड़कों पर उतर जाते हैं।
हर वाहन के लिए केंद्र सरकार की अलग-अलग गाइडलाइन है। यह भी सच है कि सड़क पर चलने से पहले वाहन को क्रैश टेस्ट समेत कई सर्टिफिकेट लेना अनिवार्य है, लेकिन यह सर्टिफिकेट उद्योग विभाग द्वारा जारी किए जाते हैं। वहां से सर्टिफिकेट मिलने के बाद परिवहन विभाग में मॉडल अप्रूव होता है, इसके बाद इसे वाहन पोर्टल पर लिस्टेड कर लिया जाता है। ई-रिक्शा के लिए भी यही नियम और प्रक्रिया है। परिवहन विभाग हर साल फिटनेस जांच करता है, जिसमें तय मानकों के अनुरूप जांच की जाती है। इसमें क्रैश टेस्ट, बॉडी स्ट्रक्चर जैसी जांच शामिल नहीं होते, क्योंकि वह पहले ही उद्योग विभाग से अप्रूव्ड होते हैं। वाहनों की बॉडी बनाने का काम ऑल इंडिया स्टेंडर्ड के तहत काम किया जाता है।
किरण शर्मा, डिप्टी ट्रांसपोर्ट कमिश्नर