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छग में ट्रेनों में नो-रूम का संकट सीट के लिए मारामारी, हरिद्वार-कामाख्या से वाराणसी तक बढ़ी परेशानी

दुर्ग-रायपुर से कई बड़े शहरों की सीधी कनेक्टिविटी नहीं, मौजूदा ट्रेनों में लंबी वेटिंग ने बढ़ाई यात्रियों की मुश्किलें,दुर्ग-रायपुर रेल क्षेत्र में लंबी दूरी की ट्रेनों में बढ़ती वेटिंग ने यात्रियों की परेशानी बढ़ा दी है। हरिद्वार के लिए सीधी नियमित ट्रेन नहीं होने से यात्रियों को बिलासपुर जाकर उत्कल एक्सप्रेस पकड़नी पड़ती है।
छग में ट्रेनों में नो-रूम का संकट सीट के लिए मारामारी, हरिद्वार-कामाख्या से वाराणसी तक बढ़ी परेशानी

प्रेम कुमार,रायपुर: दुर्ग-रायपुर से देश के प्रमुख शहरों की यात्रा करने वाले यात्रियों की परेशानी बढ़ती जा रही है। कई रूटों पर सीधी ट्रेन नहीं होने के साथ मौजूदा ट्रेनों में लंबी वेटिंग और नो-रूम की स्थिति है। हरिद्वार के लिए यात्रियों को बिलासपुर जाना पड़ रहा है, जबकि कामाख्या और वाराणसी रूट पर भी कंफर्म टिकट मिलना मुश्किल हो रहा है।

रायपुर-दुर्ग के यात्रियों पर वेटिंग का डबल अटैक

रायपुर-दुर्ग रेल क्षेत्र से देश के कई प्रमुख शहरों के लिए ट्रेनों का संचालन होता है, लेकिन यात्रियों की बढ़ती संख्या के बीच कई रूटों पर सीधी ट्रेन नहीं होने और मौजूदा ट्रेनों में लंबी वेटिंग ने परेशानी बढ़ा दी है। हरिद्वार जाने वाले यात्रियों को बिलासपुर जाकर ट्रेन पकड़नी पड़ रही है, जबकि कामाख्या जाने वाली कर्मभूमि एक्सप्रेस में स्लीपर से लेकर एसी तक नो-रूम की स्थिति सामने आ रही है। वाराणसी और मुंबई रूट पर भी सीटों की मांग अधिक होने से यात्रियों को कंफर्म टिकट के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। ऐसे में यात्रियों को या तो यात्रा की तारीख बदलनी पड़ रही है या फिर दूसरे विकल्प तलाशने पड़ रहे हैं।

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हरिद्वार जाना है तो पहले बिलासपुर पहुंचिए

दुर्ग और रायपुर से हरिद्वार के लिए सीधी नियमित ट्रेन नहीं होने से यात्रियों की परेशानी सबसे ज्यादा सामने आ रही है। यात्रियों को पहले बिलासपुर पहुंचना पड़ता है और वहां से उत्कल एक्सप्रेस पकड़कर हरिद्वार की यात्रा करनी होती है। यात्री राम कुमार के अनुसार, दुर्ग से बिलासपुर पहुंचने में करीब दो घंटे लग जाते हैं। इसके बाद ट्रेन के समय के हिसाब से अतिरिक्त इंतजार और स्थानीय परिवहन का खर्च भी जुड़ जाता है। परिवार के साथ यात्रा करने वाले लोगों, बुजुर्गों और महिलाओं के लिए यह व्यवस्था और मुश्किल हो जाती है।

कामाख्या की ट्रेन में सीट नहीं, नो-रूम ने बढ़ाई टेंशन

कामाख्या के लिए कर्मभूमि एक्सप्रेस प्रमुख विकल्पों में शामिल है, लेकिन यह साप्ताहिक ट्रेन होने के कारण यात्रियों का दबाव काफी अधिक है। मौजूदा स्थिति में स्लीपर और एसी दोनों श्रेणियों में नो-रूम की स्थिति है। यात्रियों के लिए विकल्प सीमित होने के कारण कंफर्म टिकट मिलना मुश्किल हो रहा है। इससे पूर्वोत्तर की ओर जाने वाले यात्रियों को यात्रा की तारीख बदलने या दूसरे रूट से सफर करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

वाराणसी रूट पर भी लंबी वेटिंग

वाराणसी जाने वाले यात्रियों के लिए सारनाथ और गोंदिया-बरौनी जैसी ट्रेनों के विकल्प हैं। वहीं दुर्ग-नौतनवा एक्सप्रेस भी सप्ताह में तीन दिन संचालित होती है। लेकिन यात्रियों की मांग के मुकाबले विकल्प सीमित होने से इन ट्रेनों में भी कंफर्म टिकट के लिए लंबी वेटिंग देखने को मिल रही है।

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मुंबई रूट पर भी सीटों का दबाव

रायपुर और दुर्ग मुंबई-हावड़ा रेल कॉरिडोर के अहम हिस्से हैं। मुंबई की ओर जाने वाली ट्रेनों में लगातार यात्री दबाव बना रहता है। त्योहार, छुट्टियों और विशेष अवसरों के दौरान सीटों की मांग और बढ़ जाती है। ऐसे में नई ट्रेनों का संचालन या मौजूदा ट्रेनों के फेरे बढ़ाने से यात्रियों को अतिरिक्त विकल्प मिल सकते हैं और मौजूदा ट्रेनों पर दबाव भी कम किया जा सकता है।

सांसद विजय बघेल ने रेल मंत्री से रखीं बड़ी मांगें

यात्रियों की परेशानी को देखते हुए दुर्ग सांसद विजय बघेल ने रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव को पत्र भेजकर नई ट्रेनों के संचालन और मौजूदा सेवाओं को नियमित करने की मांग की है।सांसद ने दुर्ग-हरिद्वार स्पेशल और दुर्ग-सुल्तानपुर स्पेशल को नियमित करने, जबकि दुर्ग-नौतनवा एक्सप्रेस को प्रतिदिन चलाने का प्रस्ताव रखा है। इसके अलावा दुर्ग-अमृतसर एक्सप्रेस, दुर्ग-बनारस वंदे भारत और कामाख्या-दुर्ग अमृत भारत एक्सप्रेस शुरू करने की मांग भी की गई है।

इंटरसिटी ट्रेनों के विस्तार का भी प्रस्ताव

यात्रियों की कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए दुर्ग-अंबिकापुर इंटरसिटी और कोरबा-रायपुर इंटरसिटी को दुर्ग तक विस्तारित करने का प्रस्ताव भी रखा गया है। इन ट्रेनों के विस्तार से छत्तीसगढ़ के अलग-अलग हिस्सों से दुर्ग और रायपुर आने-जाने वाले यात्रियों को अतिरिक्त सीधी कनेक्टिविटी मिल सकती है।

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नई ट्रेन की मांग के बाद तुरंत संचालन क्यों नहीं?

रेलवे के स्तर पर किसी नई ट्रेन के प्रस्ताव को लागू करने से पहले कई तकनीकी और परिचालन पहलुओं की जांच की जाती है। सबसे पहले संबंधित रूट पर लाइन क्षमता और ट्रेन के लिए टाइम स्लॉट की उपलब्धता देखी जाती है। इसके बाद रैक और कोच, पिट लाइन, मेंटेनेंस सुविधा, लोको पायलट, ट्रेन मैनेजर और अन्य कर्मचारियों की उपलब्धता का आकलन किया जाता है। इसके साथ ही ट्रैक, सिग्नल और इलेक्ट्रिक सिस्टम की क्षमता तथा संभावित यात्री मांग को भी जांचा जाता है।

रेलवे ने कहा- मांग की व्यवहारिकता का होगा परीक्षण

बिलासपुर मुख्यालय के सीपीआरओ शेख समी उर रहमान के मुताबिक, सांसद द्वारा की गई मांगों का संबंधित विभागों की ओर से गहन विश्लेषण किया जाता है। मांग की व्यवहारिकता, यात्री सुविधा और अन्य आवश्यक पहलुओं का परीक्षण करने के बाद ही इस संबंध में निर्णय लिया जाता है।

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बिलासपुर मुख्यालयको अब सीधे कनेक्टिविटी का इंतजार

हरिद्वार, कामाख्या, वाराणसी, अमृतसर और मुंबई जैसे प्रमुख रूटों पर बढ़ता यात्री दबाव बताता है कि रायपुर-दुर्ग क्षेत्र से लंबी दूरी की ट्रेनों की मांग लगातार बनी हुई है। अब यात्रियों की नजर इस बात पर है कि रेलवे सांसद की मांगों पर कब तक फैसला करता है और किन रूटों पर नई या नियमित ट्रेन सेवा शुरू होती है।

PREM

मै प्रेम निर्मलकर मैने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत दैनिक भास्कर से की, विगत 18 वर्षों से मुझे पत...Read More

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