पहाड़, झरने और गुफाएं...दमोह के जंगलों में छिपी हजारों साल पुरानी विरासत, चट्टानों पर आज भी जिंदा हैं आदिम मानव के शैलचित्र

दमोह जिले की हटा तहसील का मड़ियादो क्षेत्र अपनी पहाड़ियों, झरनों और घने जंगलों के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन यहां की सबसे बड़ी पहचान चट्टानों और गुफाओं में बने प्राचीन शैलचित्र हैं। सफेद और गेरूए रंगों से बनाए गए ये चित्र आदिम मानव की कला, संस्कृति और जीवनशैली की कहानी बयां करते हैं।
शैलचित्रों में दिखती है प्राचीन जीवन की झलक
विशेषज्ञों के अनुसार, इन चित्रों में शिकार, नृत्य, दैनिक गतिविधियों और उस समय के सामाजिक जीवन के संकेत दिखाई देते हैं। माना जाता है कि लिपि के विकास से पहले इंसान चित्रों के माध्यम से अपने विचार और संदेश व्यक्त करता था।
जिले के कई इलाकों में मिले हैं शैलचित्र
दमोह जिले के आलमपुर, वर्धा, सिलापरी, नसैनिया, नीमखेड़ा, बटियागढ़, गुंजी-नोनपानी, कंसा, भिलौनी, फतेहपुर (अजबधाम) और मड़ियादो-चौरैया क्षेत्र की गुफाओं और चट्टानों पर भी ऐसे शैलचित्र मिले हैं। हालांकि, अभी तक इनका वैज्ञानिक काल निर्धारण नहीं हो पाया है। इसलिए इनके वास्तविक इतिहास और सभ्यता से जुड़े कई सवालों के जवाब अभी बाकी हैं।

पन्ना टाइगर रिजर्व के बफर जोन में मौजूद है धरोहर
मड़ियादो से कनकपुरा गांव के पास पन्ना टाइगर रिजर्व के बफर जोन में स्थित जंगलों के मिडका, सिद्दन, पाखमार, सनगढ़ा और गऊघाट क्षेत्रों में ये शैलचित्र आज भी देखे जा सकते हैं।
इन इलाकों में सालभर प्राकृतिक जलस्रोत बने रहते हैं और यहां वन्यजीवों तथा पक्षियों की कई प्रजातियां पाई जाती हैं। समय के साथ कुछ चित्र धुंधले पड़ गए हैं, लेकिन कई चित्र अब भी स्पष्ट दिखाई देते हैं।
प्राकृतिक सुंदरता और इतिहास का अनोखा संगम
स्थानीय निवासी सुधीर मिश्रा के मुताबिक, कनकपुरा के जंगलों की गुफाओं और चट्टानों पर बने ये चित्र प्राचीन मानव के अनुभवों और भावनाओं को दर्शाते हैं। घने जंगल और वन्यजीवों की मौजूदगी के कारण यहां लोगों का आना-जाना बहुत कम होता है।
संरक्षण और शोध की जरूरत
इतिहास और पुरातत्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण इन शैलचित्रों के संरक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन की जरूरत है। यदि इनका व्यवस्थित सर्वेक्षण और दस्तावेजीकरण किया जाए, तो दमोह का यह क्षेत्र प्रागैतिहासिक मानव सभ्यता के अध्ययन का बड़ा केंद्र बन सकता है। इससे क्षेत्रीय पर्यटन और स्थानीय पहचान को भी नई दिशा मिलेगी।












