मयंक तिवारी, केरल (इडुक्की)। पश्चिमी घाट की हरी-भरी पहाड़ियों में उगने वाली ‘मसालों की रानी’ छोटी इलायची लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की पहचान रही है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में रासायनिक खाद और कीटनाशकों के बढ़ते इस्तेमाल ने इसकी गुणवत्ता और स्वाद पर असर डाला है। हालात ऐसे बने कि निर्यात की गई इलायची की कुछ खेप विदेशों में गुणवत्ता परीक्षण में फेल हो गई। इसके बाद अब किसान दोबारा जैविक खेती की ओर कदम बढ़ाने लगे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से इलायची की प्राकृतिक सुगंध और स्वाद में गिरावट आई। जब इसकी बड़ी खेप दुबई सहित कुछ अन्य देशों में पहुंची तो गुणवत्ता जांच में कई सैंपल मानकों पर खरे नहीं उतरे। इससे निर्यात को झटका लगा और किसानों के सामने अपनी खेती की पद्धति पर पुनर्विचार करने की चुनौती खड़ी हो गई। देश में इलायची के कुल उत्पादन में केरल का सबसे बड़ा योगदान है। हर साल देश में लगभग 35 से 40 हजार मीट्रिक टन छोटी इलायची का उत्पादन होता है, जिसमें अकेले केरल का हिस्सा करीब 70 प्रतिशत माना जाता है। खासतौर पर इडुक्की जिला इलायची उत्पादन का प्रमुख केंद्र है।

इलायची की खेती के लिए ठंडा और नम मौसम जरूरी होता है। पहले इस इलाके में साल में 6 से 8 महीने तक अच्छी बारिश होती थी, लेकिन जंगलों की कटाई और जलवायु परिवर्तन के असर से अब बारिश का समय और मात्रा दोनों घट गई हैं। कई बार चार महीने भी पर्याप्त बारिश नहीं हो पाती। हालांकि अभी भी यहां का तापमान 10 से 35 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है, जो इलायची की खेती के लिए अनुकूल माना जाता है। इसके बावजूद मौसम में हो रहे बदलाव खेती के लिए नई चुनौती बनते जा रहे हैं।
विदेशी बाजार से मिली शिकायतों के बाद अब किसानों को फिर से जैविक खेती की ओर प्रोत्साहित किया जा रहा है। इस दिशा में भारतीय इलायची अनुसंधान संस्थान किसानों को वैज्ञानिक मार्गदर्शन दे रहा है। संस्थान ने कीट नियंत्रण की ऐसी तकनीक विकसित की है जिसमें लाभकारी कीटों की मदद से हानिकारक कीटों को खत्म किया जाता है। इससे रासायनिक कीटनाशकों की जरूरत काफी कम हो जाती है। किसानों को जैविक खाद, वर्मी कंपोस्ट और नीम की खली जैसे प्राकृतिक विकल्प अपनाने के लिए भी प्रेरित किया जा रहा है। इससे मिट्टी की उर्वरता बेहतर होती है और इलायची की खुशबू तथा गुणवत्ता भी सुधरती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक जैविक तरीके से उगाई गई इलायची को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अच्छा दाम मिलता है। कई देशों में इसकी कीमत सामान्य इलायची से 20 से 30 प्रतिशत तक अधिक मिल रही है। इससे किसानों को भी आर्थिक लाभ हो रहा है और निर्यात की संभावनाएं मजबूत हो रही हैं।
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इस पहल को लेकर संस्थान के प्रमुख वैज्ञानिक अंसार अली का कहना है कि पारंपरिक खेती को वैज्ञानिक तकनीकों से जोड़ना जरूरी है। उनके मुताबिक जलवायु परिवर्तन बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है, इसलिए कीटों के जैविक नियंत्रण और रोग-प्रतिरोधी किस्मों के विकास पर जोर दिया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि किसानों को रासायनिक उर्वरकों का संतुलित उपयोग करने और जैविक विकल्प अपनाने के लिए जागरूक किया जा रहा है। मिट्टी की जांच और कीट प्रबंधन पर नि:शुल्क सलाह भी दी जा रही है ताकि किसानों की लागत कम हो और उत्पादन की गुणवत्ता अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनी रहे।