क्या UP में बदलेगा सियासी गेम? अखिलेश के PDA की काट के लिए बीजेपी ने बिछाया नया जाल

उत्तर प्रदेश देश की राजनीति में सबसे महत्वपूर्ण राज्यों में शामिल है, जहां लोकसभा की 80 सीटें हैं। देश की कुल 543 लोकसभा सीटों में यूपी की हिस्सेदारी करीब 15 फीसदी है। 2027 का विधानसभा चुनाव सिर्फ लखनऊ की सत्ता का मुकाबला नहीं माना जा रहा, बल्कि इसके नतीजों का असर 2029 की राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है। नितिन नबीन की टीम में यूपी से स्मृति ईरानी, हरीश द्विवेदी, रेखा वर्मा, संगीता यादव, अमरपाल मौर्य, डॉ. भोला सिंह, तारिक मंसूर और कुंवर बासित अली जैसे चेहरों को जिम्मेदारी मिली है। प्रतापगढ़ के डॉ. स्वदेश सिंह को राष्ट्रीय मंत्री बनाया गया है, जबकि महाराष्ट्र के विनोद तावड़े को यूपी का प्रभारी बनाया गया है। नियुक्तियों में महिलाओं के साथ ओबीसी, दलित, ब्राह्मण और मुस्लिम समुदायों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश नजर आती है।
यूपी के आठ चेहरों पर सबसे ज्यादा चर्चा
नितिन नबीन की नई राष्ट्रीय टीम में उत्तर प्रदेश से शामिल चेहरों को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है। पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की राजनीतिक जमीन उत्तर प्रदेश रही है, जबकि बस्ती से दो बार सांसद रहे हरीश द्विवेदी को भी अहम जिम्मेदारी मिली है। धौरहरा से सांसद रहीं रेखा वर्मा, राज्यसभा सांसद संगीता यादव और अमरपाल मौर्य भी टीम का हिस्सा हैं। बुलंदशहर के सांसद डॉ. भोला सिंह, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति तारिक मंसूर और बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष कुंवर बासित अली को भी राष्ट्रीय स्तर पर जिम्मेदारी दी गई है।
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क्षेत्रीय संतुलन साधने की कोशिश
विश्लेषकों के अनुसार इन नियुक्तियों को सिर्फ व्यक्तिगत पदों के तौर पर नहीं देखना चाहिए। उनके अनुसार बीजेपी ने नई टीम में क्षेत्रीय, जातीय और महिला प्रतिनिधित्व का संतुलन साधने की कोशिश की है। बीजेपी ने उत्तर प्रदेश को संगठन के लिहाज से काशी, गोरखपुर, अवध, कानपुर-बुंदेलखंड, ब्रज और पश्चिम क्षेत्र में बांटा है। नई टीम में शामिल चेहरे इन अलग-अलग क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं। स्मृति ईरानी काशी क्षेत्र से, हरीश द्विवेदी पूर्वी यूपी और गोरखपुर क्षेत्र से, जबकि रेखा वर्मा रुहेलखंड क्षेत्र से आती हैं।
सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश
नई टीम में महिलाओं के साथ ओबीसी, दलित, ब्राह्मण और मुस्लिम समुदायों को प्रतिनिधित्व मिलने को भी राजनीतिक नजरिए से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। प्रदेश की राजनीति को समझने वाले वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी के लिए सामाजिक समीकरण काफी अहम हैं। बीजेपी के भीतर 2020-21 के दौरान ब्राह्मणों के बीच नाराजगी की धारणा को लेकर चर्चा हुई थी। हाल के महीनों में ब्राह्मण विधायकों की अलग बैठक और समुदाय को लेकर बढ़ती राजनीतिक हलचल ने भी पार्टी नेतृत्व को सतर्क किया है। हालांकि बीजेपी के भीतर यह तर्क भी दिया जाता है कि संगठन और सरकार में ब्राह्मणों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिला है। ऐसे में नई टीम के जरिए अलग-अलग सामाजिक समूहों को साधने की कोशिश को चुनावी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।
यूपी में सबसे ज्यादा 80 लोकसभा सीटें
बीजेपी इस पूरी कवायद को किसी चुनावी रणनीति या विपक्ष के नैरेटिव के जवाब के तौर पर देखने से इनकार कर रही है। विश्लेषकों के अनुसार राष्ट्रीय संगठन में यूपी को मिली बड़ी हिस्सेदारी का सीधा संबंध चुनाव से नहीं है। उनके मुताबिक बीजेपी की राष्ट्रीय टीम किसी क्षेत्रीय दल के नैरेटिव को काउंटर करने के लिए नहीं बनती। उत्तर प्रदेश राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण राज्य है और सबसे ज्यादा 80 लोकसभा सीटें यहीं से आती हैं। इसी वजह से राष्ट्रीय टीम में राज्य को उसकी राजनीतिक भूमिका के अनुपात में भागीदारी मिली है। इस नजरिए से पार्टी नियुक्तियों को संगठनात्मक जरूरत और यूपी के महत्व से जोड़कर देख रही है।
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नियुक्तियों के असर पर अलग-अलग राय
विश्लेषकों का मानना है कि यूपी से शामिल चेहरों को सिर्फ सामाजिक प्रतिनिधित्व के नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं होगा। किसी समुदाय के नेता को संगठन में जगह देना तभी प्रभावी होगा, जब उस समुदाय में उसकी वास्तविक पकड़ और लोकप्रियता भी हो। वह मानते हैं कि केवल दलित, पिछड़ा या किसी अन्य सामाजिक समूह से प्रतिनिधित्व दिखाने से चुनावी असर पैदा नहीं किया जा सकता। इन नियुक्तियों को फिलहाल ज्यादा कॉस्मेटिक और कम प्रभावी माना जा रहा हैं कुछ नए चेहरों की अपनी सामाजिक या राजनीतिक पकड़ सीमित है। बीजेपी ने इन नियुक्तियों पर काफी सोच-विचार के बाद फैसला लिया है। तारिक मंसूर के मामले में यह नई नियुक्ति नहीं है, क्योंकि वह पहले से बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष थे और नई टीम में भी इसी पद पर बरकरार हैं। कुंवर बासित अली भी बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चे के अध्यक्ष हैं और उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर जिम्मेदारी मिली है। ऐसे में नई टीम का वास्तविक राजनीतिक असर 2027 के विधानसभा चुनाव के दौरान ही ज्यादा स्पष्ट होगा।





















