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लॉयल हो तो DNA टेस्ट कराने में क्या दिक्कत? तलाक केस में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने तलाक से जुड़े एक मामले में कहा कि खास परिस्थितियों में बच्चे का पैटरनिटी यानी DNA टेस्ट कराया जा सकता है। कोर्ट ने बेवफाई और बच्चे के जैविक पिता होने पर उठे विवाद में फैमिली कोर्ट और बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। जानिए पूरा मामला, कोर्ट की टिप्पणी और DNA टेस्ट को लेकर क्या कहा गया।
लॉयल हो तो DNA टेस्ट कराने में क्या दिक्कत? तलाक केस में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश

तलाक से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि वैवाहिक विवाद के मामलों में बच्चे का पितृत्व यानी पैटरनिटी टेस्ट कराया जा सकता है, अगर यह जांच मामले के सही नतीजे तक पहुंचने के लिए बेहद जरूरी हो। आमतौर पर शादी के दौरान पैदा हुए बच्चे की वैधता को कानून संरक्षण देता है। लेकिन अगर पति तलाक की याचिका में यह दावा करता है कि बच्चा उसका जैविक बच्चा नहीं है और इसी आधार पर पत्नी पर बेवफाई का आरोप लगाता है, तो परिस्थितियों के आधार पर DNA टेस्ट का आदेश दिया जा सकता है।

महिला ने DNA टेस्ट का किया विरोध

यह मामला सुप्रीम कोर्ट में एक महिला की याचिका के जरिए पहुंचा था। महिला ने बच्चे का DNA टेस्ट कराने के आदेश का विरोध किया। उसका कहना था कि किसी व्यक्ति को जबरन DNA टेस्ट कराने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। महिला ने यह भी तर्क दिया कि उसके पति की तलाक याचिका का फैसला DNA टेस्ट के बिना ही किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने महिला की याचिका खारिज कर दी। बेंच ने सुनवाई के दौरान सवाल किया- अगर आप ईमानदार हैं, तो आपको टेस्ट पर क्या आपत्ति होनी चाहिए? कोर्ट ने पुणे की फैमिली कोर्ट और बॉम्बे हाई कोर्ट के उन आदेशों को भी बरकरार रखा, जिनमें पति की तलाक की कार्यवाही के दौरान DNA टेस्ट कराने का निर्देश दिया गया था।

पति ने लगाया था बेवफाई का आरोप

मामले में पति ने आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी ने उसे धोखा दिया है और उनके बीच पैदा हुआ बच्चा उसका जैविक बच्चा नहीं है। पति का कहना था कि उसके इस आरोप की सच्चाई सामने लाने के लिए DNA टेस्ट बेहद जरूरी है। पति ने निजी तौर पर भी DNA टेस्ट कराया था। उसने हैदराबाद की एक लैब की रिपोर्ट कोर्ट के सामने रखी। रिपोर्ट में बच्चे के जैविक पिता होने की संभावना शून्य बताई गई थी।

Supreme Court

कोर्ट ने रिपोर्ट को माना शुरुआती आधार

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि पति की ओर से पेश की गई DNA रिपोर्ट मामले में शुरुआती आधार के तौर पर पर्याप्त है, जिससे कोर्ट DNA टेस्ट कराने का आदेश देने पर विचार कर सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस मामले में दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पति ने तलाक की याचिका में मुख्य रूप से धोखे और बेवफाई को आधार बनाया है। ऐसे में DNA टेस्ट की रिपोर्ट यह तय करने में अहम हो सकती है कि पति संबंधित बच्चे का जैविक पिता है या नहीं।

क्या हर तलाक के मामले में होगा DNA टेस्ट?

नहीं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मतलब यह नहीं है कि हर वैवाहिक विवाद या तलाक के मामले में बच्चे का DNA टेस्ट कराया जाएगा। ऐसी जांच तभी कराई जा सकती है जब मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में इसकी बहुत ज्यादा जरूरत हो और जांच का परिणाम विवाद के निपटारे के लिए महत्वपूर्ण हो।

Shivani Gupta
By Shivani Gupta

शिवानी गुप्ता | MCU, भोपाल से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में ग्रेजुएशन | 9 वर्षों की टीवी और डिजिटल तक की य...Read More

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