निर्मला सप्रे की अयोग्यता का मामला अब कानूनी और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर गरमाता दिख रहा है। विपक्ष देरी का आरोप लगा रहा है, तो सरकार जिम्मेदारी उसी पर डाल रही है। अब सबकी नजर 9 अप्रैल और 20 अप्रैल की सुनवाई पर टिक गई है।
मंगलवार को हाईकोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार की ओर से दलील दी गई कि विधानसभा अध्यक्ष को इस मामले में 90 दिनों के भीतर फैसला लेना था। लेकिन दो साल बीत जाने के बाद भी कोई निर्णय नहीं लिया गया। इसे लेकर कोर्ट के सामने देरी का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया।
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वहीं, सरकार की ओर से महाधिवक्ता ने इस दावे का कड़ा विरोध किया। उनका कहना था कि मामले में देरी की वजह खुद सिंघार हैं, जो बार-बार समय लेते जा रहे हैं। इसी कारण स्पीकर के स्तर पर फैसला लंबित है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रक्रिया जारी है और इसे जानबूझकर रोका नहीं गया।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद डिवीजन बेंच ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता 9 अप्रैल को विधानसभा अध्यक्ष के सामने अपना पक्ष रखें। इसके बाद स्पीकर उस पर विचार कर निर्णय ले सकेंगे। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 20 अप्रैल तय की है। साथ ही यह भी पूछा गया कि वर्तमान में निर्मला सप्रे किस पार्टी में हैं, जिस पर सरकार ने कहा कि वे अभी भी कांग्रेस में ही हैं।