वर्ल्ड टोबैको डे विशेष:11 साल की उम्र से शुरू हो रही लत, MP में 15 साल की उम्र तक 47.7% लड़के और 11.6% लड़कियां चख लेती हैं तंबाकू का स्वाद

प्रवीण श्रीवास्तव भोपाल। सरकार और स्वास्थ्य एजेंसियों की लगातार जागरूकता मुहिम के बावजूद मध्यप्रदेश में तंबाकू की लत कम होने के बजाय बढ़ती नजर आ रही है। हालात इतने गंभीर हैं कि प्रदेश में 15 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते करीब 47.7 फीसदी लड़के और 11.6 फीसदी लड़कियां किसी न किसी रूप में तंबाकू का सेवन शुरू कर देती हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-6 (NFHS-6) की रिपोर्ट प्रदेश के युवाओं और किशोरों के बीच तेजी से बढ़ती इस लत की चिंताजनक तस्वीर सामने लाती है। विशेषज्ञों के मुताबिक स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि कई बच्चे 11 से 12 साल की उम्र में ही तंबाकू का स्वाद चख लेते हैं और धीरे-धीरे इसकी गिरफ्त में आ जाते हैं। यही वजह है कि मध्यप्रदेश देश में मुंह के कैंसर के मामलों में भी सबसे प्रभावित राज्यों में गिना जाता है।
राष्ट्रीय औसत से कहीं आगे मध्यप्रदेश
देशभर में 15 साल की उम्र के 8.4 फीसदी लड़कियां और 36.3 फीसदी लड़के तंबाकू का सेवन करते हैं, लेकिन मध्यप्रदेश में यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत से काफी ज्यादा है। प्रदेश में लड़कियों में तंबाकू सेवन की दर 11.6 फीसदी और लड़कों में 47.7 फीसदी दर्ज की गई है। चौंकाने वाली बात यह है कि तंबाकू सेवन के मामले में मध्यप्रदेश की स्थिति उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों से भी खराब है। उत्तर प्रदेश में 15 साल की उम्र तक 9.6 फीसदी लड़कियां और 45.2 फीसदी लड़के तंबाकू का सेवन करते हैं, जबकि बिहार में यह आंकड़ा लड़कियों में केवल 4 फीसदी और लड़कों में 45.8 फीसदी है।
मुंह के कैंसर का सबसे बड़ा कारण बन रहा तंबाकू
गांधी मेडिकल कॉलेज की पॉपुलेशन बेस्ड कैंसर रजिस्ट्री के अनुसार मध्यप्रदेश में कुल कैंसर मरीजों में करीब 22 फीसदी मरीज मुंह के कैंसर से पीड़ित हैं। इनमें 17 फीसदी पुरुष और 5 फीसदी महिलाएं शामिल हैं। डॉक्टरों का मानना है कि तंबाकू और उससे जुड़े उत्पादों का बढ़ता इस्तेमाल इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है।
भोपाल में हर किलोमीटर पर 59 तंबाकू की दुकानें
एम्स भोपाल द्वारा 2024 में किए गए एक सर्वे में भी चिंता बढ़ाने वाले तथ्य सामने आए थे। सर्वे के अनुसार राजधानी के स्लम क्षेत्रों में 31 से 44 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 40 फीसदी लोग तंबाकू का सेवन करते हैं। शहर में औसतन एक किलोमीटर के दायरे में 59 तंबाकू की दुकानें मौजूद हैं। इनमें से 43 फीसदी दुकानें स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों के 100 मीटर के भीतर संचालित हो रही हैं। यह संख्या राष्ट्रीय औसत 14 दुकानों से कई गुना अधिक है। तुलना करें तो न्यूयॉर्क जैसे शहर में 10 किलोमीटर के दायरे में अधिकतम चार तंबाकू या सिगरेट की दुकानें ही मिलती हैं।
15 फीसदी छात्र कभी न कभी कर चुके हैं नशा
तंबाकू नियंत्रण अभियान से जुड़े विशेषज्ञ डॉ. ललित श्रीवास्तव के मुताबिक केंद्र सरकार की रिपोर्ट बताती है कि 15.1 फीसदी छात्र ऐसे हैं जिन्होंने जीवन में कभी न कभी किसी प्रकार के नशे का सेवन किया है। इनमें 10.3 फीसदी छात्रों ने पिछले एक साल के भीतर और 7.2 फीसदी छात्रों ने पिछले एक महीने के दौरान नशे का उपयोग किया। बच्चों और किशोरों में सबसे अधिक इस्तेमाल तंबाकू का होता है। करीब 4 फीसदी बच्चे तंबाकू का सेवन करते हैं, जबकि 3.8 फीसदी बच्चों ने शराब का सेवन किया है।
क्यों जल्दी लग जाती है लत?
जीएमसी के मनोचिकित्सा विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रुचि सोनी बताती हैं कि किशोरावस्था में मस्तिष्क तेजी से विकसित हो रहा होता है। तंबाकू और अन्य नशों में मौजूद रसायन सीधे दिमाग के रिवॉर्ड सिस्टम को प्रभावित करते हैं। इससे बच्चों को तत्काल अच्छा महसूस होता है और वे बार-बार उसी अनुभव को दोहराना चाहते हैं। लंबे समय तक तंबाकू का सेवन याददाश्त, सीखने की क्षमता, निर्णय लेने की शक्ति और भावनात्मक नियंत्रण पर गंभीर असर डाल सकता है।
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क्या किए जाएं प्रभावी उपाय?
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल चेतावनी संदेशों से काम नहीं चलेगा। स्कूल-कॉलेजों में एंटी-टोबैको क्लब सक्रिय करने, छात्रों के बीच जागरूकता कार्यक्रम चलाने, तंबाकू मुक्त परिसर अभियान को सख्ती से लागू करने और गांव स्तर तक जनजागरूकता बढ़ाने की जरूरत है। इसके अलावा कैंसर सर्वाइवर, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता और धार्मिक नेताओं को भी तंबाकू विरोधी अभियान से जोड़कर युवाओं तक सही संदेश पहुंचाया जा सकता है।
बढ़ती लत, बढ़ती चुनौती
NFHS-5 की तुलना में NFHS-6 के आंकड़े बताते हैं कि मध्यप्रदेश में लड़कियों और लड़कों दोनों के बीच तंबाकू सेवन की दर बढ़ी है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में कैंसर, हृदय रोग और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं और तेजी से बढ़ सकती हैं। वर्ल्ड टोबैको डे पर यह आंकड़े सिर्फ चेतावनी नहीं बल्कि तत्काल कार्रवाई की मांग भी कर रहे हैं।












