PU Special :अभिभावक बेसहारा, बेटियां चिंतित... ससुराल की बंदिशों के बीच मिडिएशन सेंटर पहुंच रही बेटियां

पल्लवी वाघेला, भोपाल। जिस मां ने अकेले संघर्ष कर मुझे पढ़ाया-लिखाया, आज बुढ़ापे में मैं उनका साथ कैसे छोड़ दूं? मैं अपना परिवार भी नहीं तोड़ना चाहती और मां से भी मुंह नहीं मोड़ सकती। यह दुविधा अब कई बेटियों को मिडिएशन सेंटर तक ला रही है। शादी के बाद अपने माता-पिता की जिम्मेदारी निभाने की इच्छा और ससुराल की अपेक्षाओं के बीच फंसी बेटियां बातचीत के जरिए रास्ता निकालने की कोशिश कर रही हैं।
चिंता सिर्फ खर्च की नहीं, मां के अकेलेपन की भी
मिडिएशन सेंटर में पहुंचे ज्यादातर मामलों में बेटियां सिंगल चाइल्ड हैं या उनके भाई-बहन माता-पिता की जिम्मेदारी लेने से पीछे हट चुके हैं। इनमें अधिकांश मामले ऐसी माताओं से जुड़े हैं, जो अकेली रह गई हैं और उनकी देखभाल करने वाला कोई दूसरा सदस्य नहीं है।
केस-1: मां को पास रखने के लिए अलग घर का सुझाव
भोपाल के एक मामले में 25 वर्षीय युवती ने काउंसलिंग के दौरान बताया कि उसके पिता की करीब 20 साल पहले मृत्यु हो चुकी है, जबकि उसके भाई की आठ माह पहले मौत हो गई। युवती खुद शासकीय सेवा में है और अपनी मां की जिम्मेदारी उठाना चाहती है।
केस-2: पति को घर की प्राइवेसी की चिंता
इंदौर के एक मामले में 34 वर्षीय महिला ने बताया कि उसके पति घर की प्राइवेसी और व्यवस्था का हवाला देते हुए उसकी मां को कुछ दिनों के लिए भी अपने साथ रखने के पक्ष में नहीं हैं। महिला सिंगल चाइल्ड है और उसके पिता की करीब डेढ़ साल पहले मृत्यु हो चुकी है। महिला ने काउंसलिंग में बताया कि उसकी मां की उम्र बढ़ रही है और अब उन्हें नियमित देखभाल की जरूरत है। बेटी की इच्छा थी कि उसकी मां कुछ दिन उसके साथ रहें और कुछ दिन अपने घर पर। लेकिन पति का कहना है कि मां के लंबे समय तक साथ रहने से घर की प्राइवेसी और व्यवस्था प्रभावित होगी। महिला ने काउंसलिंग के दौरान यह सवाल भी उठाया कि जब सास-ससुर घर आते हैं तो प्राइवेसी का मुद्दा नहीं उठता, फिर उसकी मां के साथ रहने पर यह समस्या क्यों है। फिलहाल इस मामले में काउंसलिंग जारी है और दोनों पक्षों के बीच सहमति बनाने की कोशिश की जा रही है।
इन मामलों में सामने आ रही प्रमुख समस्याएं
मिडिएशन सेंटर में पहुंचे मामलों में बेटियों की मुख्य मांग है कि उन्हें अपने मां या पिता को साथ रखने या अपने पास रखने की अनुमति मिले। कुछ मामलों में माता-पिता की आर्थिक मदद करने और उनसे नियमित रूप से मिलने को लेकर भी पति-पत्नी के बीच विवाद सामने आया है। काउंसलिंग में यह भी सामने आया कि बुजुर्ग माता-पिता को केवल आर्थिक मदद की जरूरत नहीं होती। कई मामलों में उनकी जरूरत भावनात्मक सहारे, नियमित बातचीत, सुरक्षा और बीमारी के समय देखभाल से जुड़ी होती है।
काउंसलिंग में बीच का रास्ता निकालने पर जोर
मिडिएशन सेंटर में ऐसे मामलों में किसी एक पक्ष को सही या गलत साबित करने के बजाय दोनों परिवारों की परिस्थितियों को समझने की कोशिश की जा रही है। उद्देश्य यह है कि ऐसा व्यावहारिक समाधान निकले जिससे वैवाहिक परिवार की व्यवस्था भी प्रभावित न हो और बुजुर्ग माता-पिता भी अकेले न पड़ें। कुछ मामलों में माता-पिता को बेटी के घर के पास रखने, उनके खर्च की व्यवस्था करने, नियमित मुलाकात तय करने या जरूरत के समय बेटी की मौजूदगी सुनिश्चित करने जैसे विकल्पों पर चर्चा की जा रही है। मध्यस्थता के जरिए अब तक सामने आए मामलों में करीब 30 प्रतिशत मामलों में रिश्तों को संभालने का रास्ता निकला है। इससे संकेत मिलता है कि बातचीत के जरिए कई पारिवारिक मतभेदों का समाधान तलाशा जा सकता है।
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सिंगल चाइल्ड परिवारों में चुनौती ज्यादा
माता-पिता की देखभाल का मुद्दा उन परिवारों में और गंभीर हो जाता है, जहां बेटी अकेली संतान होती है। ऐसे परिवारों में शादी के बाद भी बेटी के सामने अपने माता-पिता की जिम्मेदारी से जुड़ा सवाल बना रहता है। अगर माता-पिता में से एक की मृत्यु हो जाए या दूसरे भाई-बहन जिम्मेदारी से अलग हो जाएं, तो अकेली बेटी पर भावनात्मक और व्यावहारिक दोनों तरह की चिंता बढ़ जाती है। ऐसे मामलों में परिवारों के बीच संवाद की कमी विवाद को और बढ़ा सकती है।
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शादी के बाद मायके से भावनात्मक रिश्ता खत्म नहीं होता
मीडिएशन सेंटर की निदेशक प्रतिभा राजगोपाल के मुताबिक बेटी की शादी का मतलब यह नहीं है कि उसके मायके और माता-पिता के प्रति भावनात्मक संबंध खत्म हो जाएं। बेटियां अपने माता-पिता के प्रति भावनात्मक और नैतिक जिम्मेदारी महसूस करती हैं। उनके अनुसार, खासकर तब स्थिति ज्यादा संवेदनशील हो जाती है, जब माता-पिता में से कोई एक अकेला रह गया हो और उसकी देखभाल करने वाला कोई दूसरा व्यक्ति न हो। ऐसे मामलों में अधिकार और जिम्मेदारी को लेकर बहस करने के बजाय परिवारों को व्यावहारिक समाधान तलाशना चाहिए।




















