भोपाल में गर्मी का कहर:सरकारी अस्पतालों में अव्यवस्था, मरीजों के लिए वार्ड बने भट्टी; एक कूलर के भरोसे 20 पेशेंट

प्रवीण श्रीवास्तव, भोपाल। कहीं कूलर बिना पानी के चल रहे हैं तो कहीं मोटर खराब होने से सिर्फ गर्म हवा फेंक रहे हैं। दोनों अस्पतालों में एसी पंखे कूलर और वॉटर कूलर जैसे उपकरणों के रखरखाव पर सालाना 25 लाख रुपए खर्च होने के बावजूद हालात बेहद खराब हैं। पीपुल्स समाचार ने दोनों अस्पतालों का जायजा लिया तो भीषण गर्मी में अस्पतालों में मरीज और बच्चे परेशान होते दिखे।
11 मंजिला इमारत में ऊपर के वार्ड तंदूर जैसे गर्म
हमीदिया अस्पताल की नई 11 मंजिला बिल्डिंग में से शुरुआती चार मंजिलों को छोड़ दिया जाए तो बाकी की मंजिलों पर व्यवस्थाओं की पोल खुलने लगती है। 680 करोड़ की बिल्डिंग में महज 35 करोड़ रुपए बचाने पांचवें से 11वें माले तक सेंट्रल एसी सिस्टम नहीं लगाया। ऐसे में ऊपरी मंजिलों के वार्ड दोपहर से देर रात तक भट्टी जैसे गर्म रहते हैं। वार्डों में 10 से लेकर 20 मरीज तक भर्ती रहते हैं, इनके बीच सिर्फ एक कूलर लगाया गया है। सर्जरी विभाग में 18 मरीजों के बीच एक कूलर था, लेकिन उसमें पानी नहीं था। इसी तरह 11 मंजिल पर ईएनटी वार्ड में भी सिर्फ एक ही कूलर था, इसमें पानी था, लेकिन मोटर खराब हो गई थी। इसी तरह नौवीं मंजिल पर फीमेल सर्जिकल वार्ड में भी 20 मरीज भर्ती थे, लेकिन यहां एक भी कूलर नहीं था। रात 9 बजे भी उमस इतनी ज्यादा थी कि परिजनों को बेड छोड़कर कई बार वार्ड के बाहर बैठना पड़ता है।
पीने का पानी भी नसीब नहीं
गर्मी ही नहीं यहां पीने के पानी की भी समस्या है। 11वीं मंजिल पर भर्ती मरीजों को कई बार सिर्फ पीने का पानी भरने नीचे के फ्लोर पर आना पड़ता है। कई जगह वॉटर कूलर खराब पड़े हैं। अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि मेंटनेंस के लिए बजट गांधी मेडिकल कॉलेज से मिलता है, लेकिन तीन महीने से नहीं मिला। वहीं कॉलेज प्रबंधन का तर्क है कि सेंक्शन होते ही बजट जारी कर दिया जाएगा। यह स्थिति मरीजों और उनके परिजनों की परेशानी को और बढ़ा रही है। गर्मी के बीच पानी के लिए भटकना और भी मुश्किल हो जाता है। अस्पताल में मूलभूत सुविधाओं की कमी साफ नजर आ रही है।

जेपी अस्पताल में एक कूलर के भरोसे पूरा वार्ड
दोपहर करीब 3.30 बजे जेपी अस्पताल में मेडिसिन वार्ड में करीब 18 से 20 मरीज भर्ती थे। इनके बीच सिर्फ एक कूलर चल रहा है। कूलर की हवा वार्ड के आखिरी बेड तक पहुंच ही नहीं पाती। यही हाल फीमेल वार्ड के थे, यहां मरीजों के परिजन पूरी रात कभी बेड के पास तो कभी गलियारे में बैठकर समय काटते हैं। उमस इतनी ज्यादा रहती है कि मरीजों को बार-बार वार्ड से बाहर निकलना पड़ता है। पूरे वार्ड में सिर्फ एक कूलर चल रहा था, जो इतने मरीजों के लिए नाकाफी साबित हो रहा था। दोपहर में वार्ड का माहौल ऐसा लग रहा था जैसे बंद कमरे में गर्म हवा भर गई हो।

सर्जिकल और महिला वार्ड में हालात बदतर
सर्जिकल वार्ड में हालात और खराब दिखे। यहां लगे कूलर में पानी नहीं था, जिससे वह सिर्फ गर्म हवा फेंक रहा था। वार्ड के अंदर घुटन और गर्मी के बीच मरीज पसीने से तर-बतर पड़े रहे। महिला वार्ड में भर्ती मरीजों के साथ आए छोटे बच्चे भी उमस से परेशान नजर आए। कई महिलाएं अपने बेड छोड़कर खिड़की और दरवाजों के पास बैठी दिखीं ताकि थोड़ी हवा मिल सके। अस्पताल का वातावरण मरीजों के लिए राहत देने के बजाय तकलीफ बढ़ाने वाला बन गया है।
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उमस ने बढ़ाई परेशानी
अटेंडर राजेश वर्मा ने बताया कि पिताजी पहले से सांस की बीमारी से परेशान हैं, ऊपर से वार्ड की उमस उन्हें और बेचैन कर देती है। पूरी रात हम हाथ वाला पंखा चलाते रहते हैं। कई बार ऐसा लगता है जैसे वार्ड नहीं, कोई बंद गर्म कमरा हो जहां सांस लेना भी मुश्किल हो रहा है। यह स्थिति मरीज के साथ-साथ परिजनों के लिए भी बेहद कठिन हो जाती है। गर्मी के कारण इलाज का असर भी प्रभावित होता नजर आता है।
ऑपरेशन के बाद भी नहीं मिल रहा आराम-अटेंडर
अटेंडर सीमा यादव ने बताया मेरी मां ऑपरेशन के बाद भर्ती हैं, लेकिन गर्मी की वजह से उन्हें बिल्कुल नींद नहीं आ रही। कूलर सिर्फ आवाज करता है, ठंडी हवा नहीं देता। रातभर उनके सिर और हाथ पर पानी की पट्टी रखकर किसी तरह राहत देने की कोशिश करते हैं। इस स्थिति में मरीज को आराम मिलना मुश्किल हो जाता है। परिजन लगातार कोशिश कर रहे हैं, लेकिन व्यवस्थाएं उनका साथ नहीं दे रही हैं।
गर्मी ने दोगुनी की तकलीफ
दोपहर में वार्ड के अंदर खड़ा रहना तक मुश्किल हो जाता है। मरीज बार-बार घबराकर बाहर जाने की बात करते हैं। इलाज तो डॉक्टर कर रहे हैं, लेकिन यह गर्मी मरीजों की तकलीफ दोगुनी कर रही है। छोटे बच्चे और बुजुर्ग सबसे ज्यादा परेशान हैं। अस्पताल में ऐसी स्थिति चिंताजनक है और तत्काल सुधार की जरूरत महसूस की जा रही है।












