शाहिद खान, भोपाल
डोर-टू-डोर सर्वे में 100 में से 80 लोगों ने साफ कहा कि कचरा समय पर नहीं उठता और सफाई व्यवस्था बदहाल है। कई वार्डों में दो से तीन दिन तक कचरा जमा रहता है, जबकि झाड़ू भी नियमित नहीं लगती। लोगों का कहना है कि अगर हालात नहीं सुधरे तो इस बार स्वच्छता सर्वे में शहर की रैंकिंग पर सीधा असर पड़ेगा।
पीपुल्स समाचार की टीम ने शहर के 11 जोनों में जाकर 100 घरों का डोर-टू-डोर सर्वे किया, जिसमें चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई। करीब 80 फीसदी लोगों ने कहा कि कचरा कलेक्शन समय पर नहीं होता और सफाई व्यवस्था बेहद खराब है। लोगों का कहना है कि निगम के दावे सिर्फ कागजों में नजर आते हैं, जबकि जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है। रहवासियों में नाराजगी साफ दिखाई दी और ज्यादातर लोगों ने कहा कि वे स्वच्छता सर्वे में सच्चाई ही बताएंगे। उनका मानना है कि अगर समस्याएं छिपाई गईं तो हालात कभी नहीं सुधरेंगे।
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सर्वे के दौरान सामने आया कि शहर के कई इलाकों में कचरा गाड़ियां नियमित नहीं पहुंच रही हैं। लोगों ने बताया कि दो से तीन दिन में एक बार कचरा उठाया जाता है, जिससे घरों और गलियों में गंदगी जमा हो जाती है। कई बार गाड़ियां तय समय के बिना कभी भी पहुंच जाती हैं, जिससे लोग कचरा नहीं दे पाते। इसका नतीजा यह होता है कि कचरा सड़कों या खाली प्लॉट में फेंकना पड़ता है। नागरिकों का कहना है कि कलेक्शन का एक निश्चित समय तय होना चाहिए, ताकि समस्या कम हो सके।
सिर्फ कचरा कलेक्शन ही नहीं, बल्कि सड़कों और गलियों की सफाई भी बड़ी समस्या बन गई है। कई वार्डों में तीन-चार दिन तक झाड़ू नहीं लगती, जिससे कचरे के ढेर जमा हो जाते हैं। डस्टबिन ओवरफ्लो हो रहे हैं और आसपास बदबू फैल रही है। नालियां जाम होने के कारण गंदा पानी सड़कों पर बह रहा है। इससे मच्छरों और बीमारियों का खतरा भी बढ़ गया है। लोगों का कहना है कि सफाई व्यवस्था पूरी तरह लापरवाही का शिकार है।
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लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि हर साल स्वच्छता सर्वे से पहले कुछ दिनों के लिए सफाई व्यवस्था सुधारी जाती है। उस दौरान शहर साफ दिखाने की कोशिश होती है, लेकिन सर्वे खत्म होते ही हालात फिर खराब हो जाते हैं। लोगों का कहना है कि यह सिर्फ दिखावा है और असल में कोई स्थायी सुधार नहीं किया जाता। इस बार नागरिकों ने तय किया है कि वे सर्वे टीम के सामने वास्तविक स्थिति ही बताएंगे।
जल्द ही स्वच्छता सर्वेक्षण के तहत बाहरी टीमें शहर में पहुंचकर नागरिकों से फीडबैक लेंगी। ऐसे में अगर यही स्थिति बनी रही तो निगेटिव फीडबैक शहर की रैंकिंग को नुकसान पहुंचा सकता है। सर्वे में 16 से ज्यादा सवाल पूछे जाते हैं, जिनमें नागरिकों की संतुष्टि अहम होती है। जमीनी हकीकत और निगम के दावों के बीच का अंतर इस बार भारी पड़ सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि समय रहते सुधार नहीं हुआ तो शहर पिछड़ सकता है।
महापौर मालती राय का कहना है कि शहर में नियमित साफ-सफाई हो रही है और डोर-टू-डोर कचरा कलेक्शन व्यवस्थित है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर कहीं समस्या है तो उसे दिखवाया जाएगा। हालांकि ग्राउंड रिपोर्ट इससे बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करती है। नागरिकों का कहना है कि शिकायत करने के बावजूद कोई सुनवाई नहीं होती। इससे साफ है कि निगम के दावों और जमीनी स्थिति में बड़ा अंतर है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
शहर के अलग-अलग वार्डों में रहने वाले लोगों ने अपनी परेशानी खुलकर बताई। राजेश शर्मा ने कहा कि कचरा गाड़ी दो-तीन दिन तक नहीं आती, जिससे कचरा जमा हो जाता है। शबाना खान ने बताया कि गाड़ी का कोई तय समय नहीं है, जिससे दिक्कत बढ़ती है। मोहन सोनी ने सफाई व्यवस्था को पूरी तरह फेल बताया। कविता वर्मा ने कहा कि डोर-टू-डोर कलेक्शन सिर्फ कागजों में है। इरफान अली ने टाइम फिक्स करने की मांग की, जबकि सुनीता पटेल ने झाड़ू न लगने की समस्या उठाई। दिनेश कुशवाह ने कहा कि सिर्फ सर्वे से पहले सफाई होती है। फरजाना बेगम ने बीमारी फैलने का खतरा बताया और अशोक तिवारी ने ओवरफ्लो डस्टबिन की समस्या बताई। पायल सेन ने निगम के दावों और हकीकत में अंतर को उजागर किया।