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बस्तर में धर्मांतरण पर ग्राम सभाओं का सख्त रुख,बड़े बोदल में लगा बोर्ड, बाहरी प्रचारकों की एंट्री पर रोक

परंपरा की रक्षा के लिए ग्राम सभा का कड़ा संदेश, धार्मिक गतिविधियों से पहले लिखित अनुमति की शर्त,छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में धर्मांतरण और आदिवासी परंपराओं को लेकर बहस तेज है। जगदलपुर के नजदीक नानगुर तहसील के बड़े बोदल गांव में ग्राम सभा के निर्णय के बाद चेतावनी बोर्ड लगाया गया है। ग्रामीणों ने लिखित अनुमति के बिना बाहरी प्रचारकों और कुछ धार्मिक सभाओं पर रोक की बात कही है।
बस्तर में धर्मांतरण पर ग्राम सभाओं का सख्त रुख,बड़े बोदल में लगा बोर्ड, बाहरी प्रचारकों की एंट्री पर रोक

रायपुर/जगदलपुर:  छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में आदिवासी परंपराओं, धर्मांतरण और धार्मिक गतिविधियों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। जगदलपुर के नजदीक नानगुर तहसील के बड़े बोदल गांव में ग्रामीणों ने ग्राम सभा के निर्णय के बाद चेतावनी बोर्ड लगाया है। इसमें ग्राम सभा की लिखित अनुमति के बिना बाहरी पादरियों, प्रचारकों और कुछ धार्मिक सभाओं के आयोजन पर रोक की बात कही गई है। ग्रामीण इसे अपनी पारंपरिक आस्था और संस्कृति की रक्षा से जोड़ रहे हैं।

बड़े बोदल में ग्राम सभा का फैसला, अटल चौक पर लगाया सूचना बोर्ड

बस्तर के बड़े बोदल गांव में धार्मिक गतिविधियों और धर्मांतरण को लेकर ग्राम सभा ने सख्त रुख अपनाया है। गांव के केंद्र अटल चौक पर लगाए गए सार्वजनिक सूचना बोर्ड के जरिए बाहरी पादरियों, ईसाई मिशनरियों और प्रचारकों की गतिविधियों को लेकर नियमों की जानकारी दी गई है। गांव के पुजारी सुखराम नाग के अनुसार, 14 अक्टूबर को अटल चौक पर आयोजित ग्राम सभा में इस मुद्दे पर चर्चा की गई थी। इसके बाद ग्रामीणों ने ग्राम सभा की लिखित अनुमति के बिना गांव में ईसाई प्रार्थना सभा, कथित चंगाई सभा और बाहरी प्रचारकों के प्रवेश पर रोक लगाने संबंधी निर्णय लिया।

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चंगाई सभाओं पर ग्रामीणों ने उठाए सवाल

ग्रामीणों का आरोप है कि बीमारी ठीक करने और चमत्कार दिखाने के दावों के जरिए कुछ लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए प्रभावित किया जा रहा था। उनका कहना है कि ऐसी गतिविधियों से गांव की पारंपरिक मान्यताओं और सामाजिक व्यवस्था पर असर पड़ रहा है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध जानकारी से नहीं होती है। धार्मिक गतिविधियों और धर्मांतरण से जुड़े किसी भी विवाद में संबंधित पक्षों का बयान और प्रशासनिक जांच महत्वपूर्ण होगी।

देवगुड़ी, माटी पूजा और शीतला पूजा को लेकर चिंता

ग्रामीणों का कहना है कि आदिवासी समाज की पारंपरिक आस्था में देवगुड़ी, माटी पूजा और शीतला पूजा का विशेष महत्व है। उनके अनुसार, धर्मांतरण के बाद कुछ परिवार इन परंपराओं से दूरी बनाने लगे हैं, जिससे सामाजिक और सांस्कृतिक टकराव की स्थिति बन रही है। ग्राम सभा से जुड़े लोगों का तर्क है कि स्थानीय रीति-रिवाजों और सामुदायिक परंपराओं को संरक्षित रखने के लिए यह कदम उठाया गया है।

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पेसा कानून का हवाला, लेकिन कानूनी दायरे पर भी सवाल

ग्रामीणों ने अपने निर्णय के समर्थन में पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम यानी पेसा कानून, 1996 का हवाला दिया है। अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को परंपराओं, सामुदायिक संसाधनों और स्थानीय सामाजिक व्यवस्थाओं से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण अधिकार प्राप्त हैं। हालांकि, ग्राम सभा के निर्णय की कानूनी वैधता और उसके दायरे का आकलन लागू कानूनों तथा संबंधित परिस्थितियों के आधार पर ही किया जा सकता है। किसी व्यक्ति के धार्मिक विश्वास, शांतिपूर्ण उपासना या आवागमन पर रोक लगाने का अधिकार केवल बोर्ड लगाने से स्वतः स्थापित नहीं हो जाता।

नारायणपुर से कोंडागांव तक धर्मांतरण और परंपराओं को लेकर तनाव

बस्तर संभाग के विभिन्न इलाकों में धर्मांतरण, धार्मिक पहचान, अंतिम संस्कार और पारंपरिक रीति-रिवाजों को लेकर विवादों की खबरें पहले भी सामने आती रही हैं। उपलब्ध विवरण के अनुसार, नारायणपुर, कांकेर और कोंडागांव के कुछ गांवों में भी ग्राम सभाओं की पाबंदियों, धार्मिक गतिविधियों के विरोध और अंतिम संस्कार से जुड़े विवादों का उल्लेख किया गया है। इन अलग-अलग घटनाओं की वर्तमान स्थिति, संबंधित पक्षों के बयान और प्रशासनिक कार्रवाई की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। इसलिए सभी गांवों में एक जैसी स्थिति होने या किसी पूरे समुदाय को जिम्मेदार ठहराने से बचना चाहिए।

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आगे क्या? प्रशासन की भूमिका अहम

बड़े बोदल में लगाए गए बोर्ड और ग्राम सभा के निर्णय के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि स्थानीय प्रशासन इस मामले में क्या रुख अपनाता है। विवाद की स्थिति में कानून-व्यवस्था बनाए रखना, ग्रामीणों की सांस्कृतिक चिंताओं को सुनना और सभी नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना प्रशासन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होगी। फिलहाल, बड़े बोदल का मामला आदिवासी परंपराओं की रक्षा, धर्मांतरण को लेकर ग्रामीणों की चिंताओं और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन से जुड़ा हुआ है।

PREM

मै प्रेम निर्मलकर मैने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत दैनिक भास्कर से की, विगत 18 वर्षों से मुझे पत...

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