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प्राकृतिक इंडिगो साड़ी से बगरू की पहचान :अब चुनिंदा कारीगर ही संभाल रहे विरासत सिल्क एग्जीबिशन के नाम सेव है

बगरू प्रिंट की सबसे बड़ी खासियत इसकी प्राकृतिक रंगाई है। इसमें मजीठ, फिटकरी, हरड़, इमली के बीज व फूल, अनार के छिलके, हल्दी, प्राकृतिक गोंद, आयरन एक्सट्रैक्ट और अलिज़ारिन जैसे तत्वों का उपयोग किया जाता है।
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अब चुनिंदा कारीगर ही संभाल रहे विरासत सिल्क एग्जीबिशन के नाम सेव है
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    प्रभा उपाध्याय, इंदौर। बगरू क्षेत्र की पारंपरिक इंडिगो प्रिंट साड़ियां आज भी अपनी प्राकृतिक रंगाई और खास तकनीक के लिए जानी जाती हैं, लेकिन इस विरासत को संभालने वाले कारीगरों की संख्या लगातार घट रही है। बगरू के कारीगर नितेश छीपा बताते हैं कि पहले छिपा समुदाय के करीब 150 परिवार इस काम से जुड़े थे, लेकिन अब मेहनत ज्यादा और मुनाफा कम होने के कारण केवल 3-4 परिवार ही इस कला को जीवित रखे हुए हैं।

    बास्केटबॉल ग्राउंड में आयोजित सिल्क एग्जीबिशन में जयपुर के कारीगर नितेश छिपा ने बताया कि इस साड़ी को तैयार करने के लिए एक विशेष प्रकार की झाड़ी इंडिगोफेरा टिंक्टोरिया (इंडियन इंडिगो) का उपयोग किया जाता है। इसकी पत्तियों को सुखाकर और किण्वन प्रक्रिया से पाउडर तैयार किया जाता है, जिसकी कीमत 3000 से 8000 रुपये प्रति किलो तक होती है। इसी प्राकृतिक रंग से कपड़े को इंडिगो रंग (नीले) में रंगा जाता है।

    प्राकृतिक सामग्री का होता है उपयोग 

    बगरू प्रिंट की सबसे बड़ी खासियत इसकी प्राकृतिक रंगाई है। इसमें मजीठ, फिटकरी, हरड़, इमली के बीज व फूल, अनार के छिलके, हल्दी, प्राकृतिक गोंद, आयरन एक्सट्रैक्ट और अलिज़ारिन जैसे तत्वों का उपयोग किया जाता है। यही कारण है कि ये साड़ियां त्वचा के लिए सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल मानी जाती हैं।

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    एक्सपोर्ट में बढ़ी मांग

    बगरू की इंडिगो साड़ियां हाई-क्लास ग्राहकों के बीच काफी लोकप्रिय हैं। ऑस्ट्रेलिया, दुबई और जापान जैसे देशों में इनकी खास मांग है,कारीगरों से यह साड़ी 10 से 15 हजार रुपये में बिकती है, जबकि बुटीक में इसकी कीमत कई गुना बढ़ जाती है। जिससे यह पारंपरिक कला वैश्विक पहचान बना रही है।

    युवा पीढ़ी परंपरा को आगे बढ़ाने की कर रही तैयारी

    छिपा समुदाय के 22 वर्षीय आकाश छिपा ने बताया कि वे इस पारंपरिक कला को सीख रहे हैं, ताकि अपने परिवार की विरासत को जीवित रखा जा सके। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी अब आधुनिक तरीकों के साथ इस कला को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रही है।
    आकाश के अनुसार, इस साड़ी को तैयार करने में लागत काफी अधिक आती है। यही वजह है कि समुदाय के कई लोग स्वयं साड़ी बनाने के बजाय उन कारीगरों के साथ मिलकर काम करते हैं, जो पहले से इस काम में जुड़े हैं। वे उनके साथ काम कर मजदूरी के रूप में आय अर्जित कर लेते हैं।उन्होंने यह भी बताया कि इस साड़ी की बाजार में अच्छी मांग है, जिससे इस पारंपरिक कला के भविष्य को लेकर उम्मीदें बनी हुई हैं।

    Aakash Waghmare
    By Aakash Waghmare

    आकाश वाघमारे | MCU, भोपाल से स्नातक और फिर मास्टर्स | मल्टीमीडिया प्रोड्यूसर के तौर पर 3 वर्षों का क...Read More

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