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भोपाल :एनएबीएच की सख्ती टली: आयुष्मान के हजारों मरीजों को राहत, अस्पतालों की एक्सेस बनी प्राथमिकता

एनएबीएच सर्टिफिकेट अस्पतालों की गुणवत्ता का राष्ट्रीय मानक है, जो क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया के तहत दिया जाता है। इसमें मरीज सुरक्षा, संक्रमण नियंत्रण, स्टाफ ट्रेनिंग और इलाज की गुणवत्ता की सख्त जांच होती है।
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एनएबीएच की सख्ती टली: आयुष्मान के हजारों मरीजों को राहत, अस्पतालों की एक्सेस बनी प्राथमिकता
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    पीपुल्स संवाददाता, भोपाल। मध्यप्रदेश में आयुष्मान भारत योजना के तहत इलाज कराने वाले गरीब मरीजों के लिए बड़ी राहत की खबर है। सरकार ने निजी अस्पतालों पर लागू होने वाली एनएबीएच फाइनल सर्टिफिकेट की अनिवार्यता टाल दी गई है, जिससे मरीजों को इलाज की उपलब्धता बनी रहेगी।

    मालूम हो कि प्रदेश में राजधानी सहित चारों बड़ों शहरों में आयुष्मान योजना से जुड़े निजी अस्पतालों को संबद्धता के लिए एक अप्रैल से एनबीएच सर्टिफिकेट अनिवार्य किया जा रहा था। इसके दायरे में मप्र के 300 से ज्यादा अस्पताल आ रहे थे, लेकिन मरीजों की चिंता करते हुए सरकार ने अंतिम समय में स्वास्थ्य विभाग ने फैसला बदलते हुए इस शर्त को फिलहाल स्थगित कर दिया है। सरकार ने यह फैसला ऐसे समय में लिया है। जब समीक्षा में सामने आया कि चारों शहरों में कुल सैकड़ों अस्पतालों में से सिर्फ 55 ही एनएबीएच फाइनल लेवल तक पहुंच पाए हैं। यदि नियम लागू होता तो बड़ी संख्या में अस्पताल योजना से बाहर हो जाते और गरीब मरीजों के इलाज के विकल्प अचानक कम हो जाते। अब सरकार ने अस्पतालों को दो साल का अतिरिक्त समय दिया है। यानी 2028 तक उन्हें यह सर्टिफिकेट हासिल करना होगा।

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    मरीजों पर क्या पड़ता असर

    यदि नियम लागू होता, तो भोपाल के 194, इंदौर के 82, ग्वालियर के 71 और जबलपुर के 37 अस्पतालों में से बड़ी संख्या योजना से बाहर हो जाती। इसका सीधा असर उन गरीब मरीजों पर पड़ता, जो मुफ्त इलाज के लिए इन अस्पतालों पर निर्भर हैं।

    क्या है एनएबीएच सर्टिफिकेशन

    एनएबीएच सर्टिफिकेट अस्पतालों की गुणवत्ता का राष्ट्रीय मानक है, जो क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया के तहत दिया जाता है। इसमें मरीज सुरक्षा, संक्रमण नियंत्रण, स्टाफ ट्रेनिंग और इलाज की गुणवत्ता की सख्त जांच होती है। इसके तीन स्तर-एंट्री, प्रोग्रेसिव और फाइनल होते हैं, जिनमें फाइनल सबसे कठिन माना जाता है।

    नया एंगल: सिस्टम की तैयारी बनाम जमीनी हकीकत

    इस फैसले ने यह साफ कर दिया है कि सरकारी योजनाओं में सिर्फ नियम बनाना काफी नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर उनकी व्यवहारिकता भी जरूरी है। छह महीने की समयसीमा में अधिकांश अस्पताल ठअइऌ फाइनल स्तर तक नहीं पहुंच पाए, जिससे यह संकेत मिला कि सिस्टम अभी पूरी तरह तैयार नहीं है।
    अधिकारी का बयान:
    मरीजों के हित में फिलहाल नियम को लागू नहीं किया जा रहा है। लेकिन दो साल बाद इसे सख्ती से लागू किया जाएगा।

    — आईएएस योगेश भर्सट, सीईओ आयुष्मान मप्र

    Aakash Waghmare
    By Aakash Waghmare

    आकाश वाघमारे | MCU, भोपाल से स्नातक और फिर मास्टर्स | मल्टीमीडिया प्रोड्यूसर के तौर पर 3 वर्षों का क...Read More

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