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Dhar Bhojsala:भोजशाला केस में अयोध्या जैसे सिद्धांतों की एंट्री, 10 निष्कर्षों ने खोला इतिहास, कोर्ट ने माना मंदिर का अस्तित्व

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले ने भोजशाला विवाद को नई दिशा दी है। अदालत ने पुरातात्विक प्रमाणों, शिलालेखों और ऐतिहासिक दस्तावेजों को ध्यान में रखते हुए परिसर के मूल स्वरूप पर बड़ा निष्कर्ष दिया। इस निर्णय में ASI रिपोर्ट को बेहद महत्वपूर्ण माना गया और इसे विवाद के समाधान का मुख्य आधार बताया गया। आइए विस्तार से जानते हैं वे 10 बड़े आधार, जिन पर कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया।
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भोजशाला केस में अयोध्या जैसे सिद्धांतों की एंट्री, 10 निष्कर्षों ने खोला इतिहास, कोर्ट ने माना मंदिर का अस्तित्व
फाइल फोटो

धार। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने धार जिले के प्रसिद्ध भोजशाला–कमाल मौला मस्जिद विवाद पर एक अहम फैसला सुनाया है, जिसने पूरे देश में चर्चा छेड़ दी है। अदालत की डिवीजन बेंच ने ASI की रिपोर्ट, ऐतिहासिक दस्तावेजों और पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर यह माना कि यह स्थल मूल रूप से देवी सरस्वती को समर्पित एक प्राचीन मंदिर और शिक्षा केंद्र था। कोर्ट ने यह भी कहा कि मौजूदा संरचना पुराने मंदिर के अवशेषों पर बनी है। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या केस के सिद्धांतों को भी आधार बनाया गया है, जिससे यह निर्णय और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

  1. एएसआई रिपोर्ट से मिला सबसे बड़ा आधार
    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सबसे ज्यादा भरोसा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट पर किया। कोर्ट ने कहा कि सर्वे में मिले पत्थर, संरचना और अवशेष इस बात की ओर इशारा करते हैं कि यहां पहले एक बड़ा और विकसित मंदिर मौजूद था। रिपोर्ट में वैज्ञानिक जांच के आधार पर यह स्पष्ट किया गया कि मौजूदा ढांचा किसी पुराने धार्मिक निर्माण पर तैयार किया गया है।
  2. परमार काल की वास्तुकला के निशान
    कोर्ट ने अपने फैसले में परमार काल की वास्तुकला को महत्वपूर्ण सबूत माना। स्तंभों, नक्काशी और निर्माण शैली से यह साफ हुआ कि यह संरचना 10वीं–11वीं शताब्दी की हो सकती है। उस समय धार क्षेत्र पर राजा भोज का शासन था और यह क्षेत्र शिक्षा और धर्म का बड़ा केंद्र माना जाता था।
  3. संस्कृत शिलालेखों से मिला ऐतिहासिक संकेत
    स्थल पर मिले शिलालेखों में संस्कृत और प्राकृत भाषा का उपयोग पाया गया। इनमें धार्मिक मंत्र और देवी सरस्वती से जुड़े शब्द भी शामिल थे। कोर्ट ने कहा कि ये शिलालेख इस बात को मजबूत करते हैं कि यहां प्राचीन समय में धार्मिक गतिविधियां होती थीं और यह एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा होगा।
  4. देवी-देवताओं की मूर्तियों के प्रमाण
    एएसआई रिपोर्ट में गणेश, शिव, भैरव और अन्य देवी-देवताओं की आकृतियां मिलीं। अदालत ने कहा कि इन मूर्तियों का क्षतिग्रस्त होना इस ओर इशारा करता है कि समय के साथ स्थल के मूल स्वरूप में बदलाव किया गया। यह भी माना गया कि यह स्थान पहले एक मंदिर के रूप में उपयोग में था।
  5. पुराने मंदिर के अवशेषों से बनी संरचना
    कोर्ट ने यह भी कहा कि मौजूदा इमारत पूरी तरह नई नहीं है। इसमें पुराने मंदिर के पत्थरों और निर्माण सामग्री का उपयोग किया गया है। संरचना में जो असमानता दिखाई देती है, वह इस बात का प्रमाण है कि यह जगह पुनर्निर्माण और बदलाव से गुजरी है।
  6. शिक्षा केंद्र होने के ऐतिहासिक प्रमाण
    ब्रिटिश कालीन गजेटियर और अन्य दस्तावेजों में इस स्थान को शिक्षा केंद्र बताया गया है। कोर्ट ने कहा कि यहां संस्कृत पढ़ाई और धार्मिक शिक्षा दी जाती थी। इसे राजा भोज से जुड़ा एक महत्वपूर्ण ज्ञान केंद्र माना गया, जिससे इसका ऐतिहासिक महत्व और बढ़ जाता है।
  7. पुरातात्विक खुदाई से मिले पुराने अवशेष
    1972–73 की खुदाई में यहां से मिट्टी के बर्तन, पत्थर के टुकड़े और मूर्तियों के अवशेष मिले थे। इन खोजों से यह संकेत मिला कि यहां पहले एक व्यवस्थित धार्मिक और सांस्कृतिक परिसर मौजूद था, जो लंबे समय तक उपयोग में रहा होगा।
  8. वक्फ संपत्ति का दावा साबित नहीं हुआ
    कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि मुस्लिम पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि यह जमीन वक्फ संपत्ति है। अदालत ने कहा कि वक्फ के लिए कानूनी समर्पण के प्रमाण जरूरी होते हैं, जो इस मामले में उपलब्ध नहीं थे।
  9. 1935 का आदेश कानूनी रूप से कमजोर
    धार रियासत के 1935 के आदेश को अदालत ने केवल प्रशासनिक निर्णय माना और उसे कानूनी रूप से मजबूत नहीं माना गया। कोर्ट ने कहा कि यह आदेश ऐतिहासिक और संवैधानिक आधार पर टिकाऊ नहीं है, इसलिए इसे मुख्य आधार नहीं बनाया जा सकता।
  10. धार्मिक प्रतीकों से पहचान स्पष्ट
    कोर्ट ने कहा कि स्थल पर मिले धार्मिक प्रतीक, मूर्तियां और शिलालेख इसकी मूल पहचान को स्पष्ट करते हैं। इन सबूतों के आधार पर अदालत ने माना कि यह स्थान हिंदू धार्मिक परंपरा और सरस्वती उपासना से जुड़ा रहा है।

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भोजशाला का इतिहास

भोजशाला का इतिहास 11वीं शताब्दी से जुड़ा माना जाता है। मान्यता के अनुसार यहां मां सरस्वती का मंदिर और शिक्षा का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। कहा जाता है कि 12वीं और 13वीं शताब्दी के दौरान मंदिर को ध्वस्त कर वहां मकबरा और मस्जिद का निर्माण कराया गया।

Aditi Rawat
By Aditi Rawat

अदिति रावत | MCU, भोपाल से M.Sc.(न्यू मीडिया टेक्नॉलजी) | एंकर, न्यूज़ एक्ज़िक्यूटिव की जिम्मेदारिय...Read More

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