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संपत्ति विवाद में सुप्रीम कोर्ट का संदेश:पिता की जमीन-जायदाद में बेटियों का हक, भाइयों की आपसी सहमति से खत्म नहीं होगा बहनों का अधिकार

पिता की संपत्ति में बेटियों के अधिकार को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कहा कि अगर पिता की मृत्यु बिना वसीयत के होती है तो बेटी भी बेटे की तरह बराबर की हिस्सेदार होगी। भाइयों के आपसी बंटवारे से बेटियों का कानूनी अधिकार खत्म नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि पुराने बंटवारे के नाम पर बेटियों को संपत्ति से बाहर रखना कानून के खिलाफ है।
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पिता की जमीन-जायदाद में बेटियों का हक, भाइयों की आपसी सहमति से खत्म नहीं होगा बहनों का अधिकार
SUPREME COURT

नई दिल्ली। देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने बेटियों के संपत्ति अधिकार को लेकर ऐसा फैसला दिया है, जिसे महिलाओं के अधिकारों की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कोर्ट ने कहा है कि पिता की संपत्ति पर बेटियों का हक केवल इसलिए खत्म नहीं हो सकता क्योंकि भाइयों ने आपस में जमीन या घर का बंटवारा कर लिया। अगर पिता ने कोई वसीयत नहीं छोड़ी है, तो बेटी भी कानून के अनुसार ‘क्लास-1 वारिस’ मानी जाएगी और उसे बराबरी का हिस्सा मिलेगा। यह फैसला कर्नाटक के एक पारिवारिक विवाद की सुनवाई के दौरान सामने आया है।

कर्नाटक के परिवार से जुड़ा था पूरा मामला

यह मामला कर्नाटक के रहने वाले बीएम सीनप्पा नाम के व्यक्ति की संपत्ति से जुड़ा हुआ था। उनकी साल 1985 में बिना वसीयत के मृत्यु हो गई थी। परिवार में उनकी पत्नी, तीन बेटियां और चार बेटे थे। पिता के निधन के बाद बेटों ने पहले आपसी सहमति से और बाद में साल 2000 में रजिस्टर्ड दस्तावेज के जरिए संपत्ति का बंटवारा कर लिया। सबसे बड़ी बात यह रही कि इस पूरे बंटवारे में बेटियों को शामिल नहीं किया गया। उन्हें संपत्ति में किसी तरह का हिस्सा नहीं दिया गया। लंबे समय तक चुप रहने के बाद बेटियों ने अपने अधिकार के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया।

बेटियों ने अदालत में क्या कहा?

साल 2007 में बेटियों ने कोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए कहा कि उनके पिता की मृत्यु बिना वसीयत के हुई थी। ऐसे में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के तहत उन्हें भी संपत्ति में बराबर का अधिकार मिलना चाहिए। दूसरी तरफ भाइयों ने अदालत में दलील दी कि संपत्ति का बंटवारा साल 2000 में ही हो चुका था और यह 2005 के संशोधन से पहले का मामला है। इसलिए यह बंटवारा पूरी तरह वैध और सुरक्षित माना जाना चाहिए। इसी आधार पर पहले कर्नाटक हाईकोर्ट ने बेटियों की याचिका खारिज कर दी थी।

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सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलटा

सुप्रीम Court की जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले को गलत ठहराया। अदालत ने कहा कि कानून की धारा 6(5) केवल उन पुराने बंटवारों को बचाती है, जो पहले से पूरे हो चुके थे। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि बेटियों का उत्तराधिकार का अधिकार खत्म हो जाएगा। कोर्ट ने साफ कहा कि बेटी का अधिकार केवल जन्म से मिलने वाले कॉपार्सनरी अधिकार तक सीमित नहीं है। वह पिता की संपत्ति में प्रथम श्रेणी की वारिस भी होती है। इसलिए उसे बराबर हिस्सा मिलना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि यह तय करना जरूरी है कि पुराना बंटवारा कानूनी रूप से सही था या नहीं और क्या वह बेटियों पर लागू होता है। यह एक तथ्यात्मक विवाद है, जिसकी जांच ट्रायल कोर्ट में सबूतों के आधार पर होगी।

ट्रायल कोर्ट को फिर से सुनवाई के निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले को वापस ट्रायल कोर्ट भेज दिया है। अदालत ने निर्देश दिया कि अब इस मामले में सभी सबूतों और दस्तावेजों की दोबारा जांच की जाए। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि जब तक फैसला नहीं आता, तब तक संपत्ति की मौजूदा स्थिति में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। इस फैसले को महिलाओं के अधिकारों के लिए बेहद अहम माना जा रहा है क्योंकि कई परिवारों में आज भी बेटियों को संपत्ति से दूर रखा जाता है।

महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करेगा फैसला

कानूनी जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आने वाले समय में हजारों महिलाओं को न्याय दिलाने का काम करेगा। अक्सर परिवारों में भाइयों के बीच बंटवारा कर बेटियों को नजरअंदाज कर दिया जाता है, लेकिन अब अदालत ने साफ कर दिया है कि ऐसा करना आसान नहीं होगा। अगर पिता की मृत्यु बिना वसीयत के होती है, तो बेटी का अधिकार भी बेटे जितना ही मजबूत रहेगा। अदालत का यह फैसला समाज में बराबरी और महिलाओं के सम्मान की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

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वकील डॉ. गिरधर प्रसाद उपवंशी ने क्या कहा?

वकील डॉ. गिरधर प्रसाद उपवंशी ने इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि 20 जनवरी 2004 से पहले अगर किसी संपत्ति का विधिवत और रजिस्टर्ड दस्तावेज के जरिए बंटवारा हुआ है, तभी उसे मान्यता मिलेगी। उन्होंने कहा कि यह फैसला बेटियों के अधिकारों को मजबूत करने वाला है और अब लड़कियों को अपने माता-पिता की संपत्ति में आसानी से कानूनी हक मिल सकेगा। उन्होंने कहा कि समाज में लंबे समय से बेटियों को संपत्ति से दूर रखने की सोच रही है लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद महिलाओं को न्याय मिलने का रास्ता और मजबूत होगा।

Aditi Rawat
By Aditi Rawat

अदिति रावत | MCU, भोपाल से M.Sc.(न्यू मीडिया टेक्नॉलजी) | एंकर, न्यूज़ एक्ज़िक्यूटिव की जिम्मेदारिय...Read More

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