इंदौर। मालवा की धरती पर गर्म और शुष्क जलवायु वाले ड्रेगन फ्रूट भी उत्पादित होने लगे हैं। इन फलों को तैयार करने की विधि महू के जामली में रहने वाला युवक दिनेश पाटीदार (किसान) वियतमान से सीखकर आया। छह साल से वह ड्रेगन फ्रूट की खेती कर अपनी आजीविका का न सिर्फ बेहतर निर्वहन कर रहा, बल्कि गांव के किसानों को भी इसके लिए प्रेरित कर रहा है।

दिनेश ने बताया कि वह वर्ष 2014 में वियतमान गया था। यहां उसने ड्रेगन फ्रूट के पौधे देखे तो उसके मन में भी फ्रूट तैयार करने की इच्छा जागी। वहां से फ्रूट तैयार करने के तरीके सीखकर वर्ष 2020 में इसके 20 पौधे रोपित किए। प्रारंभ में उसे इन्हें बेचने में पसीना बहाना पड़ा। धीरे-धीरे अपने छह एकड़ खेत में पौधे लगा दिए। इन पौधे से हर साल 2 से 3 टन फल उत्पादित होते हैं।
युवा किसान दिनेश ने बताया कि इन फलों को तैयार करने में सालाना साढ़े पांच लाख रुपए खर्च होते हैं। कृषक दिनेश के अनुसार, पौधों को यहां के तापमान में जीवित रखने सफेद मिट्टी (चाइना क्ले) नामक स्प्रे का इस्तेमाल करना पड़ता है। इस मिट्टी से पौधे के चारों ओर महीन दीवार बनाई जाती है। यह दीवार काफी गर्म होती है, जिससे पौधे मुरझाते नहीं हैं। इन फलों के वह वियतमान, दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर, गुजरात आदि जगह बेचते हैं।

ड्रेगन फ्रूट मूल रूप से दक्षिण-मध्य अमेरिका और मेक्सिको का फल है, जो अब भारत के गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, बिहार (किशनगंज/समस्तीपुर), और पूर्वोत्तर राज्यों में प्रमुखता से उगाया जाता है। यह गर्म और शुष्क जलवायु में अच्छी तरह फलता-फूलता है और कैक्टस परिवार का सदस्य है।