PU Special :पशुओं में एंटीबायोटिक का दुरुपयोग इंसानों के लिए बन रहा खतरा, बेअसर हो सकती हैं जरूरी दवाएं

मयंक तिवारी, जबलपुर। एक मां बुखार से तपते बच्चे को गोद में लेकर अस्पताल पहुंचती है। डॉक्टर इलाज के लिए एंटीबायोटिक दवा देते हैं, लेकिन दवा का असर नहीं होता। इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि एंटीबायोटिक के लगातार और गैर-जरूरी इस्तेमाल से बैक्टीरिया में दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो गई हो। पशुपालन में एंटीबायोटिक का अनियंत्रित उपयोग इसी खतरे को बढ़ाने वाले कारकों में शामिल है। पोल्ट्री फार्म, मवेशियों और मछली पालन में इन दवाओं का इस्तेमाल कई बार बीमारी के इलाज के बजाय वजन बढ़ाने या बीमारियों से बचाव के लिए किया जाता है। इससे ऐसे बैक्टीरिया पनप सकते हैं, जिन पर सामान्य एंटीबायोटिक दवाएं असर करना बंद कर देती हैं। इन्हें आमतौर पर सुपरबग कहा जाता है। यह समस्या केवल पशुओं तक सीमित नहीं रहती। प्रतिरोधी बैक्टीरिया दूषित खाद्य पदार्थों, पानी और पशुओं के सीधे संपर्क के जरिए इंसानों तक पहुंच सकते हैं। इसका असर यह होता है कि इंसानों में होने वाले सामान्य संक्रमणों का इलाज भी मुश्किल हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि एंटीबायोटिक का इस्तेमाल केवल जरूरत के मुताबिक और पशु चिकित्सक की सलाह पर बीमार पशुओं के इलाज के लिए किया जाना चाहिए। इन्हें वजन बढ़ाने के लिए चारे में मिलाना बंद करना जरूरी है।
क्या है एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस और कैसे पैदा होता है सुपरबग का खतरा?
एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस या एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) ऐसी स्थिति है, जिसमें बैक्टीरिया दवाओं के असर के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं। बार-बार और जरूरत से ज्यादा एंटीबायोटिक इस्तेमाल होने पर संवेदनशील बैक्टीरिया खत्म हो सकते हैं, लेकिन प्रतिरोधी बैक्टीरिया बचकर बढ़ने लगते हैं। समय के साथ ऐसे बैक्टीरिया पर सामान्य दवाओं का असर कम हो जाता है। पशुओं को बिना जरूरत या लंबे समय तक एंटीबायोटिक देने से भी यह खतरा बढ़ सकता है। पोल्ट्री, मवेशियों और मछली पालन में इनके गैर-चिकित्सीय इस्तेमाल से विकसित प्रतिरोधी बैक्टीरिया खाद्य शृंखला और पर्यावरण के जरिए इंसानों तक पहुंच सकते हैं। इस तरह पशुओं में दवाओं का गलत इस्तेमाल मानव स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर चुनौती बन जाता है।
इंसानों के इलाज पर पड़ सकता है असर
- जरूरी दवाएं हो सकती हैं बेअसर: पशुओं में एंटीबायोटिक के अनुचित इस्तेमाल से विकसित प्रतिरोधी बैक्टीरिया इंसानों तक पहुंचने पर इलाज में इस्तेमाल होने वाली कुछ सामान्य एंटीबायोटिक के असर को कम कर सकते हैं। इससे डॉक्टरों के पास संक्रमण के इलाज के विकल्प सीमित हो सकते हैं।
- इलाज में लग सकता है ज्यादा समय: जब संक्रमण पैदा करने वाले बैक्टीरिया सामान्य दवाओं से खत्म नहीं होते, तो मरीज को लंबे समय तक इलाज की जरूरत पड़ सकती है। गंभीर मामलों में अस्पताल में भर्ती रहने की अवधि भी बढ़ सकती है।
- इलाज का खर्च बढ़ने का खतरा: प्रतिरोधी संक्रमणों में अधिक प्रभावी या महंगी दवाओं की जरूरत पड़ सकती है। लंबे इलाज और अस्पताल में ज्यादा समय बिताने से मरीज और उसके परिवार पर आर्थिक बोझ बढ़ सकता है।
दूध, मांस और अंडों के जरिए भी पहुंच सकता है खतरा
पशुओं में एंटीबायोटिक के दुरुपयोग का असर खाद्य शृंखला तक पहुंच सकता है। मांस, दूध, अंडे और मछली जैसे खाद्य पदार्थों के उत्पादन और प्रसंस्करण के दौरान स्वच्छता में कमी या दूषित उत्पादों के संपर्क से प्रतिरोधी बैक्टीरिया इंसानों तक पहुंच सकते हैं। पशुपालन और पोल्ट्री से जुड़े लोग भी संक्रमित पशुओं, उनके मल-मूत्र, दूषित पानी या आसपास के वातावरण के सीधे संपर्क में आने से इनके संपर्क में आ सकते हैं। इसलिए यह समस्या सिर्फ पशुओं को दी जाने वाली दवाओं तक सीमित नहीं है। इसका संबंध खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण और आम लोगों के स्वास्थ्य से भी है।
चारे में ग्रोथ प्रमोटर के तौर पर एंटीबायोटिक का इस्तेमाल रोकना जरूरी
विशेषज्ञों के मुताबिक एंटीबायोटिक का इस्तेमाल पशुओं में संक्रमण के इलाज के लिए जरूरत के अनुसार होना चाहिए। बिना चिकित्सकीय जरूरत के इन्हें नियमित रूप से चारे में मिलाना या वजन बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करना खतरनाक साबित हो सकता है। पशुओं के बेहतर स्वास्थ्य के लिए टीकाकरण, साफ-सफाई, संतुलित आहार और पशु आवास की उचित व्यवस्था पर ध्यान देना भी जरूरी है। इससे बीमारियों का खतरा कम किया जा सकता है और एंटीबायोटिक पर निर्भरता घटाई जा सकती है। एंटीबायोटिक का उपयोग पशु चिकित्सक की सलाह और निर्धारित मात्रा के अनुसार ही होना चाहिए।
विशेषज्ञों की राय: अब ज्यादा डोज की पड़ रही जरूरत
डॉ. आदित्य परिहार, एमडी, मेडिसिन के मुताबिक, मवेशियों यानी गाय, भैंस आदि को दिए जाने वाले चारे में एंटीबायोटिक मिलाने का असर केवल पशुओं तक सीमित नहीं रहता। इसका प्रभाव दूध, मांस, खाद्य शृंखला और अंततः इंसानों के स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है। इसका सबसे गंभीर खतरा एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) है, जिसमें बैक्टीरिया पर सामान्य एंटीबायोटिक दवाएं असर करना बंद कर देती हैं।
डॉ. परिहार का कहना है कि WHO और भारत में प्रकाशित शोध भी इस खतरे की पुष्टि करते हैं। उनके अनुसार अब कुछ ऐसी बीमारियों में भी एंटीबायोटिक की ज्यादा डोज देने की जरूरत देखने को मिल रही है, जिनमें पहले आदर्श बॉडी वेट के हिसाब से निर्धारित मात्रा प्रभावी होती थी।
डॉ. विश्वजीत रॉय, इंचार्ज डायरेक्टर फार्म, वेटरनरी यूनिवर्सिटी, जबलपुर का कहना है कि सघन पशुपालन में एंटीबायोटिक का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल पशुओं की वृद्धि तेज करने और उन्हें बीमारियों से बचाने के लिए किया जाता है। लंबे समय तक इस तरह इस्तेमाल करने से प्रतिरोधी बैक्टीरिया पनप सकते हैं। ये बैक्टीरिया मांस, दूध, पानी और सीधे संपर्क के जरिए इंसानों तक पहुंचकर सामान्य संक्रमणों का इलाज मुश्किल बना सकते हैं। डॉ. रॉय के मुताबिक इस खतरे को कम करने के लिए एंटीबायोटिक के गैर-चिकित्सीय इस्तेमाल पर सख्त रोक जरूरी है। इसके साथ ही पशुओं का नियमित टीकाकरण, बेहतर स्वच्छता और पशुपालन की वैज्ञानिक व्यवस्थाएं अपनानी होंगी।
बेअसर होने वाली एंटीबायोटिक दवाओं की जानकारी दे रहा एम्स, हर 6 महीने में रिपोर्ट अपडेट भी कर रहा
दवाओं का असर बचाना आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य के लिए जरूरी
एंटीबायोटिक दवाएं इंसानों और पशुओं दोनों के इलाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। लेकिन इनका गलत और जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल भविष्य में गंभीर स्वास्थ्य संकट पैदा कर सकता है। जब बैक्टीरिया दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं, तो सामान्य संक्रमणों का इलाज भी कठिन हो सकता है। इसलिए पशुओं को एंटीबायोटिक देने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना, चारे में इनके गैर-जरूरी इस्तेमाल को रोकना और पशुपालन में स्वच्छता व टीकाकरण को बढ़ावा देना जरूरी है। यह केवल पशुओं के स्वास्थ्य का सवाल नहीं, बल्कि इंसानों के लिए जीवनरक्षक दवाओं का असर बनाए रखने और आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी भी है।




















