अब तक युद्ध में हजारों की संख्या में नागरिक मारे गए हैं। ईरान भी हमलों का लगातार जवाब दे रहा है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि रूस और चीन ने क्यों चुप्पी साधी है, आइए आपको समझाते है।
बीती 28 फरवरी को अमेरिका-इजराइल ने ईरान पर हमला किया। इस ज्वाइंट सैन्य हमले को ऑपरेशन ‘एपिक क्यूरी’ नाम दिया गया। इस दौरान ईरान की राजधानी तेहरान में परमाणु और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। हमले में जब ईरानी सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हुई। तब से ही ईरान की तरफ से युद्ध और तेज हो गया।
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मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान का एक और पुराना साथी चीन, अमेरिका का सामना करके हितों को खतरे में डालने नहीं चाहता है। खास बात यह है कि मिडिल ईस्ट में युद्ध चीनी हितों को खतरे में डालता है। ईरान की धमकियों ने होर्मुज स्ट्रेट से ट्रैफिक को असल में रोक दिया है, जो अरब सागर तक फारस की खाड़ी का एकमात्र रास्ता है। इसी रास्ते से ज्यादातर तेल का आयात होता है। दूसरी एशियाई इकॉनमी के अलावा, चीन मिडिल ईस्ट से तेल इंपोर्ट करता है, और इस ब्लॉकेड से उसकी सप्लाई पर असर पड़ेगा।
अमेरिका-इजराइल और ईरान युद्ध को देखते हुए रुस ने इस पर चिंता जताते हुए कहा कि मिडिल ईस्ट में समस्या का समाधान कूटनीति से किया जाना चाहिए, इसके साथ ही कहा कि शांति का फाइनल ऑप्शन युद्धविराम ही है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक चीन ने दोनों देशों से सैन्य कार्रवाई रोकने की अपील की।