पोतों के नाम कर दी जमीन:फिर ऐसा क्या हुआ कि दादी ने कैंसिल करा दी गिफ्ट डीड ?

बुजुर्ग महिला ने अपने पोते और परपोते को देखभाल की उम्मीद में जमीन गिफ्ट की थी, लेकिन संपत्ति मिलने के बाद दोनों ने जिम्मेदारी निभाने से इनकार कर दिया। इसके बाद महिला ने सीनियर सिटिजन ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के बाद ट्रिब्यूनल ने गिफ्ट डीड रद्द कर जमीन का मालिकाना हक फिर से महिला को सौंप दिया।
भरोसे के साथ सौंप दी थी जमीन
लातूर जिले के करसा गांव निवासी हौसाबाई लहाड़े ने अपने जीवन के अंतिम पड़ाव को सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से अपनी करीब तीन हेक्टेयर यानी साढ़े 7 एकड़ खेती की जमीन पोते और परपोते के नाम कर दी थी। यह जमीन उन्होंने विधिवत रजिस्टर्ड गिफ्ट डीड के माध्यम से सौंपी थी। उन्हें उम्मीद थी कि परिवार के सदस्य उनके बुढ़ापे का सहारा बनेंगे और उनकी जरूरतों का ध्यान रखेंगे।
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जमीन मिलते ही बदल गया पोतों का व्यवहार
आरोप है कि जमीन अपने नाम होने के बाद दोनों पोतों का व्यवहार पूरी तरह बदल गया। बुजुर्ग महिला की देखभाल करना तो दूर, उन्हें खाना और दवाइयों जैसी मूलभूत सुविधाएं देने से भी इनकार कर दिया गया। समय के साथ स्थिति और गंभीर होती चली गई। परिवार से मिले इस व्यवहार ने हौसाबाई मानसिक तनाव में रहने लगी।
न्याय के लिए ट्रिब्यूनल पहुंचीं हौसाबाई
लगातार नजरअंदाज और प्रताड़ना का सामना करने के बाद हौसाबाई ने हार नहीं मानी। उन्होंने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए बनाए गए मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटिजंस एक्ट 2007 के तहत सीनियर सिटिजन ट्रिब्यूनल में आवेदन दायर किया। उन्होंने ट्रिब्यूनल से अपनी जमीन वापस दिलाने और न्याय की मांग की। इसके बाद मामले की विधिवत सुनवाई शुरू हुई।
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अदालत ने सेवा को माना कानूनी दायित्व
मामले की सुनवाई के दौरान ट्रिब्यूनल ने दोनों पक्षों की दलीलों का विस्तार से परीक्षण किया। पीठासीन अधिकारी ने स्पष्ट कहा कि जब कोई बुजुर्ग अपनी संपत्ति देखभाल और भरण-पोषण की शर्त पर हस्तांतरित करता है, तो यह केवल पारिवारिक वादा नहीं बल्कि कानूनी जिम्मेदारी बन जाती है। इस जिम्मेदारी का पालन न करना कानून का उल्लंघन माना जाएगा।
गिफ्ट डीड रद्द, जमीन फिर हुई महिला के नाम
सभी तथ्यों और साक्ष्यों की जांच के बाद ट्रिब्यूनल ने रजिस्टर्ड गिफ्ट डीड को निरस्त करने का आदेश दिया। इसके साथ ही राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज पोतों के नाम हटाने के निर्देश भी जारी किए गए। प्रशासन को तत्काल कार्रवाई कर जमीन का मालिकाना हक फिर से हौसाबाई के नाम बहाल करने को कहा गया। फैसले के बाद महिला को अपनी संपत्ति पर दोबारा पूरा अधिकार मिल गया।
वरिष्ठ नागरिकों के लिए बना मिसाल
यह फैसला केवल एक पारिवारिक विवाद का समाधान नहीं है, बल्कि समाज के लिए एक गुड मैसेज भी है। अदालत ने साफ किया कि बुजुर्गों की देखभाल केवल नैतिक जिम्मेदारी नहीं बल्कि कई मामलों में कानूनी दायित्व भी होती है।












