राजीव कटारे, ग्वालियर
ग्वालियर। किसानों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य नहीं मिलने की समस्या के बीच युवाओं ने खुद आगे आकर समाधान का प्रयास किया। सैलरी देकर खेती कराई और बची फसल जरूरतमंदों तक पहुंचाई, जिससे यह पहल चर्चा में है।
युवाओं ने बताया कि उन्होंने सोशल मीडिया पर किसानों की परेशानियां देखीं, जहां कई बार फसल की लागत भी नहीं निकल पाती। इसी से प्रेरित होकर उन्होंने कुछ अलग करने का निर्णय लिया। तरबूज की फसल को लेकर उन्हें जानकारी मिली कि कई किसान इसे बेच नहीं पाते। इसके बाद जनवरी 2025 में इसकी प्लानिंग की गई। यह पहल सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रही, बल्कि किसानों की आवाज को समझने और उसे आगे बढ़ाने का प्रयास भी रही।
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युवाओं ने अपने एक परिचित की मदद से बड़वानी में 5 एकड़ जमीन ली और दिसंबर से तैयारी शुरू की। मार्च तक 25 से 30 टन तरबूज का उत्पादन हुआ। यह पूरी प्रक्रिया प्लानिंग के साथ की गई, जिसमें खेती के हर चरण पर ध्यान दिया गया। उत्पादन के बाद लागत निकालकर बची फसल को समाजसेवा में उपयोग किया गया। यह प्रयोग खेती के नए मॉडल की तरह देखा जा रहा है।
इस पहल की खास बात यह रही कि जिन किसानों से खेती कराई गई, उन्हें हर माह 13 से 14 हजार रुपए सैलरी दी गई। कुल मिलाकर करीब एक लाख रुपए किसानों को दिए गए, जिससे उन्हें उनकी मेहनत का उचित भुगतान मिला। युवाओं ने करीब 15 से 20 बार बड़वानी जाकर पूरी प्रक्रिया की निगरानी भी की। इससे किसानों को आर्थिक सुरक्षा के साथ सम्मान भी मिला।
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बता दें कि युवाओं ने तरबूज को इसलिए चुना क्योंकि यह गर्मी में शरीर में पानी की कमी को पूरा करता है। लागत निकालने के बाद बचा हुआ तरबूज अस्पतालों में मरीजों और अटेंडरों को मुफ्त बांटा गया। युवाओं का कहना है कि आगे वे मशरूम और अंगूर की फसल पर भी काम करेंगे और इसी तरह जरूरतमंदों तक पहुंचाएंगे।