
दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। अमेरिकी नौसेना की नाकेबंदी के जवाब में ईरान ने एक बार फिर इस जलमार्ग को बंद कर दिया है, जिससे जहाजों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है। इसका असर कई देशों में ऊर्जा संकट के रूप में देखने को मिल रहा है, क्योंकि वैश्विक तेल सप्लाई का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।
इस संकट से निपटने के लिए 30 से अधिक देशों के सैन्य योजनाकार लंदन में एक अहम बैठक में शामिल हो रहे हैं। यह बैठक यूके के रक्षा मंत्रालय की अगुवाई में आयोजित की जा रही है। इसका उद्देश्य एक ठोस सैन्य रणनीति तैयार करना है, जिससे हालात सामान्य होने पर इस समुद्री मार्ग को सुरक्षित तरीके से दोबारा खोला जा सके।
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ब्रिटेन के रक्षा मंत्री जॉन हिली के मुताबिक, इस बैठक का मकसद कूटनीतिक सहमति को जमीनी कार्रवाई में बदलना है। उन्होंने कहा कि लक्ष्य एक संयुक्त योजना बनाना है, जिससे होर्मुज में नेविगेशन की स्वतंत्रता सुनिश्चित हो सके और स्थायी सीजफायर को समर्थन मिले। बैठक में सैन्य क्षमताओं, कमांड और कंट्रोल सिस्टम, इन्फ्रास्ट्रक्चर और क्षेत्र में संभावित सैनिक तैनाती जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा होगी।
रिपोर्ट्स के अनुसार, इस प्रस्तावित मिशन का नेतृत्व यूनाइटेड किंगडम और फ्रांस मिलकर करेंगे। इससे पहले एक वर्चुअल बैठक में यूरोप, एशिया और मिडिल ईस्ट के करीब 50 देशों ने हिस्सा लिया था, जिसके बाद इस पहल को गति मिली। इसे वैश्विक स्तर पर सामूहिक सुरक्षा प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
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हालांकि सभी 30 देशों की ऑफिशियल लिस्ट जारी नहीं की गई है, लेकिन संभावित भागीदारों में जर्मनी, इटली, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे, फिनलैंड, डेनमार्क, पोलैंड और बेल्जियम जैसे यूरोपीय देश शामिल हो सकते हैं।
इसके अलावा जापान, साउथ कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, बहरीन, UAE और कनाडा के शामिल होने की भी चर्चा है। भारत और पाकिस्तान की भागीदारी को लेकर अभी स्पष्टता नहीं है।
इस बीच अमेरिका ने ईरान के साथ सीजफायर की अवधि बढ़ाने का ऐलान तो किया है, लेकिन होर्मुज में अपनी नाकेबंदी हटाने को लेकर कोई संकेत नहीं दिया है। ऐसे में क्षेत्र में तनाव बना हुआ है और वैश्विक बाजारों पर भी इसका असर पड़ रहा है। कुल मिलाकर, होर्मुज को लेकर यह संकट अब क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक मुद्दा बन चुका है, जहां कूटनीति और सैन्य रणनीति दोनों ही साथ-साथ चल रही हैं।