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New Delhi :महिला का करियर पति की मंजूरी पर निर्भर नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कही ये बात? डेंटिस्ट महिला से जुड़ा है मामला

यह मामला एक महिला डेंटिस्ट से जुड़ा था, जिनकी शादी साल 2009 में एक आर्मी अफसर से हुई थी। पति की पोस्टिंग कारगिल में थी, इसलिए महिला वहां रहने चली गईं। बाद में बेटी की तबीयत खराब होने पर वह बेहतर इलाज के लिए अहमदाबाद लौट आईं और मायके में रहने लगीं।
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महिला का करियर पति की मंजूरी पर निर्भर नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कही ये बात? डेंटिस्ट महिला से जुड़ा है मामला

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के करियर और वैवाहिक अधिकारों को लेकर एक अहम टिप्पणी की है। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि किसी महिला का अपने पेशेवर सपनों को पूरा करना वैवाहिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ इसलिए किसी महिला के करियर को गलत ठहराना कि उससे पति या ससुराल पक्ष की भावनाएं आहत होती हैं, यह बेहद पिछड़ी सोच को दर्शाता है।

योग्य महिला को नौकरी से रोकना क्रूरता है- सुप्रीम कोर्ट

जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि आज देश महिला सशक्तिकरण की बात कर रहा है, ऐसे में किसी महिला की प्रोफेशनल पहचान को पति की मंजूरी से जोड़ना संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है। अदालत ने कहा कि 21वीं सदी में भी किसी योग्य महिला के करियर को आगे बढ़ाने के फैसले को ‘क्रूरता’ मानना चिंताजनक है।

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डेंटिस्ट महिला से जुड़ा था मामला

यह मामला एक महिला डेंटिस्ट से जुड़ा था, जिनकी शादी साल 2009 में एक आर्मी अफसर से हुई थी। पति की पोस्टिंग कारगिल में थी, इसलिए महिला वहां रहने चली गईं। बाद में बेटी की तबीयत खराब होने पर वह बेहतर इलाज के लिए अहमदाबाद लौट आईं और मायके में रहने लगीं। इसी दौरान उन्होंने अपना डेंटल करियर दोबारा शुरू किया।

क्यों अहम है फैसला?

  1. यह फैसला महिलाओं के करियर अधिकारों को मजबूत करता है
  2. कोर्ट ने विवाह और करियर के बीच संतुलन पर स्पष्ट संदेश दिया
  3. फैसले को महिला सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है
  4. इससे भविष्य में ऐसे मामलों में निचली अदालतों को भी नई दिशा मिलेगी

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निचली अदालतों ने क्या कहा था?

फैमिली कोर्ट ने अहमदाबाद में क्लिनिक खोलने और मायके में रहने को पति के प्रति ‘वैवाहिक क्रूरता’ और ‘परित्याग’ माना था। बाद में हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को सही ठहराया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों फैसलों पर हैरानी जताई और उन्हें पूरी तरह अस्वीकार्य बताया।

फैसले में क्या टिप्पणी की गई?

सुप्रीम कोर्ट ने मामले में कहा कि किसी पत्नी से यह उम्मीद करना कि वह पति की नौकरी और सुविधा के लिए अपने सपनों और करियर का बलिदान दे दे, संविधान और आधुनिक समाज की भावना के खिलाफ है। अदालत ने साफ किया कि महिलाओं को भी अपने करियर और पहचान के लिए स्वतंत्र फैसले लेने का पूरा अधिकार है।

Aakash Waghmare
By Aakash Waghmare

आकाश वाघमारे | MCU, भोपाल से स्नातक और फिर मास्टर्स | मल्टीमीडिया प्रोड्यूसर के तौर पर 3 वर्षों का क...Read More

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