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रथ यात्रा का सबसे बड़ा रहस्य!आखिर 9 दिन के लिए गुंडिचा मंदिर क्यों जाते हैं भगवान जगन्नाथ, कौन थीं उनकी 'मौसी'?

पुरी की जगन्नाथ रथ यात्रा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि भगवान और भक्त के अटूट प्रेम, विश्वास और दिए गए वचन का प्रतीक मानी जाती है। हर साल भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ श्रीमंदिर से निकलकर गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं। इस यात्रा के पीछे कई पौराणिक मान्यताएं और धार्मिक रहस्य जुड़े हुए हैं।
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आखिर 9 दिन के लिए गुंडिचा मंदिर क्यों जाते हैं भगवान जगन्नाथ, कौन थीं उनकी 'मौसी'?
रथ यात्रा का सबसे बड़ा रहस्य!

भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा के दौरान नौ दिनों तक गुंडिचा मंदिर में निवास करते हैं। मान्यता है कि यह यात्रा रानी गुंडिचा को दिए गए भगवान के वचन को निभाने का प्रतीक है। इसी दौरान हेरा पंचमी और बहुड़ा यात्रा जैसी परंपराएं भी निभाई जाती हैं। इन सभी का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व श्रद्धालुओं के लिए विशेष माना जाता है।

हर साल गुंडिचा मंदिर क्यों जाते हैं भगवान जगन्नाथ? 

आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ भव्य रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं। यह यात्रा केवल उत्सव नहीं बल्कि भगवान द्वारा अपने भक्त को दिए गए वचन को निभाने की परंपरा मानी जाती है। नौ दिनों तक भगवान वहीं विराजमान रहते हैं और विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इसी कारण यह यात्रा श्रद्धालुओं के लिए आस्था का सबसे बड़ा पर्व बन जाती है।

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रानी गुंडिचा को क्यों कहा जाता है भगवान की मौसी? 

पौराणिक मान्यता के अनुसार, पुरी के राजा इंद्रद्युम्न की पत्नी रानी गुंडिचा भगवान जगन्नाथ की अनन्य भक्त थीं। कहा जाता है कि उनकी कोई संतान नहीं थी और वे भगवान को अपने पुत्र के समान स्नेह करती थीं। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान जगन्नाथ ने हर वर्ष उनके घर आने का वचन दिया। इसी वजह से समय के साथ रानी गुंडिचा को भगवान की मौसी का सम्मानजनक स्थान मिला और आज भी रथ यात्रा उसी परंपरा का निर्वहन मानी जाती है।

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गुंडिचा मंदिर का आध्यात्मिक महत्व भी है विशेष

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गुंडिचा मंदिर केवल भगवान के विश्राम का स्थान नहीं है, बल्कि इसका आध्यात्मिक महत्व भी बेहद खास माना जाता है। कहा जाता है कि देवशिल्पी विश्वकर्मा यहीं भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की दिव्य प्रतिमाओं का निर्माण कर रहे थे। कथा के अनुसार, राजा इंद्रद्युम्न ने निर्धारित समय से पहले द्वार खोल दिया, जिससे प्रतिमाएं अधूरी अवस्था में ही रह गईं। यही कारण है कि भगवान जगन्नाथ की प्रतिमाएं आज भी विशिष्ट स्वरूप में दिखाई देती हैं।

9 दिनों तक होता है विशेष पूजन और पोड़ा पीठा का भोग

रथ यात्रा के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा पूरे नौ दिनों तक गुंडिचा मंदिर में निवास करते हैं। इस दौरान उनकी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और उन्हें पारंपरिक भोग 'पोडा पीठा' अर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि यह प्रवास भगवान और भक्त के बीच प्रेम, विश्वास और समर्पण का प्रतीक है। इसी अवधि में लाखों श्रद्धालु गुंडिचा मंदिर पहुंचकर भगवान के दर्शन करते हैं।

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हेरा पंचमी की कथा क्यों मानी जाती है सबसे रोचक? 

रथ यात्रा के पांचवें दिन हेरा पंचमी का विशेष आयोजन होता है। मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ के गुंडिचा मंदिर में ठहरने के दौरान माता लक्ष्मी श्रीमंदिर में ही रहती हैं। भगवान के देर तक वापस नहीं लौटने पर माता लक्ष्मी उन्हें बुलाने गुंडिचा मंदिर पहुंचती हैं। लोककथाओं के अनुसार, नाराज होकर वह प्रतीकात्मक रूप से भगवान के रथ का एक हिस्सा क्षतिग्रस्त कर देती हैं। यह परंपरा आज भी धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ निभाई जाती है।

बहुड़ा यात्रा और आड़प दर्शन का धार्मिक महत्व

नौ दिनों का प्रवास पूरा होने के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा पुनः श्रीमंदिर लौटते हैं। इस वापसी यात्रा को बहुड़ा यात्रा या उल्टा रथ यात्रा कहा जाता है। इसी दौरान गुंडिचा मंदिर में भगवान के दर्शन को आड़प दर्शन कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस अवधि में भगवान के दर्शन करने से सौ अश्वमेध यज्ञ के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। यही कारण है कि देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु इस पावन अवसर पर पुरी पहुंचते हैं।

Rohit Sharma
By Rohit Sharma

पीपुल्स इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया स्टडीज, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय...Read More

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