प्रदेश में सफेद, काले और भूरे बीज वाली तिल की खेती :उत्पादकता बढ़ी, तकनीक ने एमपी में बदली तिलहन की तस्वीर

हर्षित चौरसिया, जबलपुर। कैल्शियम, आयरन, प्रोटीन, विटामिन एवं एंटीआॅक्सीडेंट से भरपूर मिल को सेहत और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। मध्यप्रदेश में तिलहन की खेती अब 'परंपरा ' से निकलकर 'तकनीक ' की राह पर चल पड़ी है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद अभा समन्वित अनुसंधान परियोजना से मिले आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में तिल की खेती का रकबा पहले की तुलना में कम हुआ है, लेकिन उन्नत बीज और वैज्ञानिक प्रबंधन के दम पर कुल उत्पादन और प्रति हेक्टेयर उत्पादकता में रिकॉर्ड बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है।
इसलिए तेलों की रानी
तिल भारत की प्राचीन एवं महत्वपूर्ण तिलहनी फसल है, जिसका उल्लेख देश की कृषि, खाद्य परंपराओं तथा सांस्कृतिक प्रथाओं में लंबे समय से मिलता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक उच्च तेल प्रतिशत (लगभग 50%), 25% प्रोटीन और विशिष्ट पोषण गुणों के कारण तिल को तेलों की रानी कहा गया है।
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प्रदेश में इस तरह बढ़ा तिल का उत्पादन
वर्ष क्षेत्र उत्पादन उत्पादकता
2001-2010 166.00 60.13 352.67
2011-2020 325.79 157.74 488.66
2021-2024 329.20 159.90 499.40
2024-2025 273.00 169.00 620.00
क्षेत्र लाख हेक्टेयर में, उत्पादन लाख टन, उत्पादकता किग्रा/हेक्टेयर
तिल की अंतरराष्ट्रीय मांग
उच्च तेल मात्रा, पोषण-गुणों और बहुउपयोगिता के कारण तिल की घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार में अच्छी मांग है। सफेद तिल का उपयोग बेकरी, कन्फेक्शनरी और स्नैक्स उद्योग में किया जाता है, जबकि काला तिल पारंपरिक खाद्य एवं औषधीय उपयोगों में काम आ रहा है।
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अच्छी उत्पादकता के लिए प्रबंधन जरूरी
तिल की फसल लेने वाले किसानों को हम तकनीक के साथ उत्पादकता के लिए प्रबंधन करना भी बताते हैं। इसमें बीज उपचार, भूमि की तैयारी, बीज दर, बुवाई का समय और पौध अंतर, सिंचाई प्रबंधन, खरपतवार एवं कीट प्रबंधन के साथ उपज शामिल है।
-डॉ. एके विश्वकर्मा, परियोजना समन्वयक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद











