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रूसी तेल खरीदना पड़ सकता है महंगा!भारत पर 100% टैरिफ का खतरा, अमेरिकी सीनेट में बिल को मिला भारी समर्थन

अमेरिका में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100% टैरिफ लगाने वाले बिल को 60 से अधिक सीनेटरों का समर्थन मिला है। बिल कानून बनने पर भारत, चीन समेत बड़े खरीदार प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि यूरोपीय देशों और रूसी यूरेनियम आयात को कुछ छूट देने के प्रावधान भी शामिल हैं।
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भारत पर 100% टैरिफ का खतरा, अमेरिकी सीनेट में बिल को मिला भारी समर्थन
अमेरिका के नए बिल से भारत पर 100% टैरिफ का खतरा।

वॉशिंगटन डीसी। अमेरिका में रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है। रूसी कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की खरीद जारी रखने वाले देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने वाले विधेयक को अमेरिकी सीनेट में 60 से ज्यादा सांसदों का समर्थन मिल गया है। इस समर्थन के बाद बिल के आगे बढ़ने की संभावना काफी बढ़ गई है। अगर यह कानून बनता है तो भारत, चीन, अजरबैजान और हंगरी जैसे देश, जो रूस से ऊर्जा आयात करते हैं, अमेरिकी टैरिफ के दायरे में आ सकते हैं। हालांकि, यह विधेयक अभी कानून नहीं बना है और इसे प्रभावी होने से पहले अमेरिकी संसद के दोनों सदनों तथा राष्ट्रपति की मंजूरी की जरूरत होगी।

क्या है प्रस्तावित बिल और इसका उद्देश्य?

इस विधेयक का उद्देश्य रूस की ऊर्जा बिक्री से होने वाली आय को कम करना है, ताकि उसे आर्थिक रूप से कमजोर किया जा सके। बिल के अनुसार, राष्ट्रपति उन देशों से अमेरिका में आने वाले सामान पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगा सकते हैं, जिन्हें पिछले 12 महीनों में रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले शीर्ष पांच देशों में शामिल माना जाएगा या जो रूस पर लगे प्रतिबंधों से बचने में उसकी मदद कर रहे हों।
शुरुआत में इस प्रस्ताव में 500 फीसदी टैरिफ का प्रावधान था, लेकिन संशोधित मसौदे में इसे घटाकर 100 फीसदी कर दिया गया है।

क्यों सबसे ज्यादा चर्चा में हैं भारत और चीन?

प्रस्तावित विधेयक का सबसे बड़ा असर भारत और चीन जैसे देशों पर पड़ सकता है। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने रियायती दरों पर रूसी कच्चे तेल का आयात बढ़ाया था। इसका उद्देश्य देश की ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखना और घरेलू ईंधन कीमतों को नियंत्रित रखना था। वर्तमान में भारत अपनी जरूरत का 88 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में यदि यह बिल कानून बनता है तो भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों और ऊर्जा नीति पर इसका असर पड़ सकता है।

Russian crude oil

यूरोप और अमेरिका को मिली छूट

प्रस्तावित विधेयक में कुछ महत्वपूर्ण छूट भी दी गई हैं। इसमें उन यूरोपीय देशों को राहत देने का प्रावधान है, जो अपनी कुल गैस जरूरत का 15 प्रतिशत से कम हिस्सा रूस से आयात करते हैं और धीरे-धीरे उस पर निर्भरता कम कर रहे हैं। इसके अलावा अमेरिका द्वारा रूस से आयात किए जाने वाले कम-समृद्ध (Low-Enriched) यूरेनियम और कुछ मेडिकल आइसोटोप को भी प्रतिबंधों से बाहर रखा गया है। अमेरिका के कई परमाणु ऊर्जा संयंत्र अब भी रूस की सरकारी परमाणु कंपनी रोसाटॉम से यूरेनियम प्राप्त करते हैं।

इसी कारण इस बिल को लेकर आलोचक अमेरिका पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगा रहे हैं। उनका कहना है कि जहां दूसरे देशों पर रूसी ऊर्जा खरीदने को लेकर दबाव बनाया जा रहा है, वहीं अमेरिका और कुछ यूरोपीय देशों को राहत दी जा रही है।

राष्ट्रपति को मिलेगा विशेष अधिकार

विधेयक में अमेरिकी राष्ट्रपति को यह अधिकार भी दिया गया है कि, राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए वे किसी देश को टैरिफ या प्रतिबंधों से अस्थायी छूट दे सकते हैं। हालांकि, इसके लिए कांग्रेस को सूचना देना अनिवार्य होगा और सांसदों को आपत्ति दर्ज कराने के लिए निश्चित समय दिया जाएगा।

बिल के पीछे किसकी थी भूमिका?

इस विधेयक का मसौदा रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने तैयार किया था। बताया गया है कि उन्होंने इस कानून पर प्रशासन के साथ करीब दो सालों तक काम किया। हाल ही में उनके निधन के बाद इस विधेयक का राजनीतिक महत्व और बढ़ गया है। अब इसे दोनों दलों के कई सांसदों का समर्थन मिल चुका है।

Donald Trump

भारत की चिंता क्यों बढ़ी?

नई दिल्ली ने इस प्रस्ताव को लेकर अपनी चिंता जताई है। भारतीय अधिकारियों का मानना है कि यदि रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर टैरिफ लगाया जाता है, जबकि कई यूरोपीय देशों को छूट दी जाती है, तो यह समान व्यवहार के सिद्धांत के अनुरूप नहीं होगा।

भारत का कहना है कि ऊर्जा सुरक्षा उसकी प्राथमिकता है और रियायती दरों पर मिलने वाला रूसी कच्चा तेल देश की आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इसके अलावा भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी तेल को प्रोसेस करने के लिए अपने संयंत्रों में बड़े निवेश और तकनीकी बदलाव भी किए हैं।

क्या अभी भारत पर टैरिफ लागू हो जाएगा?

फिलहाल ऐसा नहीं है। यह प्रस्ताव अभी केवल अमेरिकी सीनेट में पेश किया गया विधेयक है। इसे कानून बनने के लिए पहले सीनेट और फिर हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स से पारित होना होगा। इसके बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के साथ ही यह प्रभावी कानून बन सकेगा। यानी फिलहाल भारत या किसी अन्य देश पर 100 प्रतिशत टैरिफ लागू नहीं हुआ है, लेकिन अगर यह विधेयक मौजूदा स्वरूप में पारित हो जाता है तो इसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार, भारत-अमेरिका व्यापार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर व्यापक रूप से देखने को मिल सकता है।

Manisha Dhanwani
By Manisha Dhanwani

मनीषा धनवानी | जागरण लेकसिटी यूनिवर्सिटी से BJMC | 6 वर्षों के पत्रकारिता अनुभव में सब-एडिटर, एंकर, ...Read More

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