देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को हरी झंडी दिखाएंगे PM मोदी :89 किमी का सफर 2 घंटे में तय करेगी, जानें कितना होगा किराया...

भारतीय रेलवे के इतिहास में आज एक नया अध्याय जुड़ने जा रहा है। देश की पहली हाइड्रोजन फ्यूल ट्रेन शुक्रवार को हरियाणा के जींद और सोनीपत के बीच अपनी पहली यात्रा शुरू करेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस ट्रेन को हरी झंडी दिखाएंगे। इसके साथ ही भारत जर्मनी, फ्रांस, स्वीडन और चीन के बाद हाइड्रोजन ट्रेन चलाने वाला दुनिया का पांचवां देश बन जाएगा। यह ट्रेन 89 किलोमीटर का सफर करीब दो घंटे में तय करेगी और फिलहाल अधिकतम 75 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलेगी।
10 कोच, 2600 से ज्यादा यात्री क्षमता
यह ट्रेन पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से तैयार की गई है। इसमें 2 हाइड्रोजन ड्राइविंग पावर कार (DPC) और 8 ट्रेलर कोच लगाए गए हैं। कुल 10 कोच वाली इस ट्रेन में लगभग 2,600 यात्री सफर कर सकेंगे। ट्रेन को भविष्य में 110 किमी प्रति घंटे की गति के लिए डिजाइन किया गया है, लेकिन शुरुआती संचालन जींद-सोनीपत रूट पर 75 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से होगा। रेलवे की योजना आगे चलकर इसे कालका-शिमला जैसे हेरिटेज रूट पर भी चलाने की है। इस परियोजना पर करीब 112 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। ट्रेन का डिजाइन और इंटीग्रेशन चेन्नई स्थित इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF) में किया गया है। हाइड्रोजन प्रोपल्शन सिस्टम मेधा सर्वो ड्राइव्स ने विकसित किया है, जबकि जींद में हाइड्रोजन उत्पादन और रिफ्यूलिंग प्लांट तैयार करने में ग्रीनएच इलेक्ट्रोसिस की अहम भूमिका रही है।
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जिंद- सोनीपत रूट से ही शुरुआत क्यों?
जींद रेलवे स्टेशन के पास देश का पहला हाइड्रोजन स्टोरेज और रिफ्यूलिंग सेंटर भी बनाया गया है। यहां पानी से इलेक्ट्रोलिसिस तकनीक के जरिए रोज करीब 430 किलोग्राम हाइड्रोजन तैयार होगी। गैस को हाई-प्रेशर टैंकों में सुरक्षित रखा जाएगा। स्टेशन पर 3,000 किलोग्राम हाइड्रोजन स्टोर की जा सकेगी, जबकि ट्रेन में एक बार में करीब 440 किलोग्राम हाइड्रोजन भरी जा सकेगी। रेलवे के अनुसार, एक बार फ्यूल भरने के बाद ट्रेन करीब 356 किलोमीटर तक चल सकती है।
हाइड्रोजन ट्रेन की तस्वीरें
आधुनिक प्रणालियों से लैस हाइड्रोजन ट्रेन 89 किमी का सफर 2 घंटे में तय करेगी
ट्रेन के इंजन पर नमो ग्रीन रेल लिखा गया
देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का साइड लुक
हाइड्रोजन ट्रेन की 2 बड़ी खासियत
Hydrogen Train की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें डीजल इंजन की जगह फ्यूल सेल तकनीक का इस्तेमाल होता है। हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक प्रक्रिया से बिजली बनती है, जिससे ट्रेन चलती है। इस प्रक्रिया में धुआं या कार्बन डाइऑक्साइड नहीं निकलती, बल्कि केवल पानी और भाप उत्सर्जित होती है। यही वजह है कि इसे पर्यावरण के अनुकूल और भविष्य की रेल तकनीक माना जा रहा है।
रेलवे का कहना है कि यह परियोजना भारतीय रेलवे को नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य की दिशा में बड़ा कदम साबित होगी। ट्रेन को सुरक्षा के लिहाज से जर्मनी की एजेंसी TÜV SÜD और PESO से आवश्यक मंजूरी भी मिल चुकी है। उद्घाटन के बाद प्रधानमंत्री मोदी जींद में कई विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास करने के साथ एक जनसभा को भी संबोधित करेंगे।
4 बड़े सवाल जो आपको जानना जरूरी है
कैसे चलती है हाइड्रोजन ट्रैन?
हाइड्रोजन ट्रेन को ऐसे समझिए जैसे इसके अंदर ही एक छोटा-सा बिजलीघर (पावर प्लांट) लगा हो। इस ट्रेन में डीजल इंजन नहीं होता। इसके बजाय हाइड्रोजन गैस को फ्यूल सेल (Fuel Cell) में भेजा जाता है। यहां हाइड्रोजन, हवा में मौजूद ऑक्सीजन के साथ रासायनिक प्रतिक्रिया करती है, जिससे बिजली बनती है। यही बिजली मोटर को चलाती है और ट्रेन आगे बढ़ती है। इस पूरी प्रक्रिया में धुआं या कार्बन डाइऑक्साइड नहीं निकलती, बल्कि केवल पानी और भाप निकलते हैं। इसलिए इसे पर्यावरण के लिए बेहद सुरक्षित माना जाता है।
1 किलो हाइड्रोजन में कितना किमी दूर तक चलेगी
भारतीय रेलवे ने अभी आधिकारिक तौर पर प्रति किलो हाइड्रोजन की दूरी का आंकड़ा जारी नहीं किया है। हालांकि उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह ट्रेन रोजाना करीब 356 किलोमीटर का सफर करेगी और इसमें लगभग 300 किलोग्राम हाइड्रोजन की खपत होगी। यानी अनुमान के हिसाब से 1 किलोग्राम हाइड्रोजन में ट्रेन लगभग 1.2 किलोमीटर चल सकती है। वहीं, ट्रेन में एक बार में करीब 440 किलोग्राम हाइड्रोजन भरी जा सकती है, जिससे यह लंबी दूरी तय करने में सक्षम होगी।
क्या है प्रोसेस कैसे तैयारी होती है हाइड्रोजन?
हाइड्रोजन प्राकृतिक रूप से अलग गैस के रूप में नहीं मिलती। इसे पानी (H₂O) से तैयार किया जाता है। पानी में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन दोनों तत्व मौजूद होते हैं। इलेक्ट्रोलिसिस (Electrolysis) नाम की प्रक्रिया में पानी में बिजली प्रवाहित की जाती है, जिससे पानी दो हिस्सों—हाइड्रोजन और ऑक्सीजन—में अलग हो जाता है। इसके बाद हाइड्रोजन गैस को इकट्ठा करके सुरक्षित टैंकों में स्टोर किया जाता है और जरूरत पड़ने पर ट्रेन में ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
तीन प्रकार के होते हैं हाइड्रोजन
हाइड्रोजन को मुख्य रूप से तीन प्रकार में बांटा जाता है, जो इसे बनाने के तरीके और उससे होने वाले प्रदूषण के आधार पर तय होते हैं।
1. ग्रीन हाइड्रोजन (Green Hydrogen)
यह सबसे स्वच्छ हाइड्रोजन मानी जाती है। इसे सौर और पवन जैसी नवीकरणीय ऊर्जा की मदद से पानी के इलेक्ट्रोलिसिस द्वारा तैयार किया जाता है। इसके उत्पादन के दौरान लगभग शून्य कार्बन उत्सर्जन होता है, इसलिए इसे भविष्य का स्वच्छ ईंधन माना जा रहा है।
2. ग्रे हाइड्रोजन (Grey Hydrogen)
यह प्राकृतिक गैस (मीथेन) से बनाई जाती है। इसके उत्पादन के दौरान बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) वातावरण में निकलती है। इसलिए यह पर्यावरण के लिए सबसे ज्यादा नुकसानदायक मानी जाती है।
3. ब्लू हाइड्रोजन (Blue Hydrogen)
यह भी प्राकृतिक गैस से ही तैयार होती है, लेकिन इसमें बनने वाली कार्बन डाइऑक्साइड को कैप्चर (Carbon Capture) करके जमीन के नीचे या अन्य सुरक्षित स्थानों पर स्टोर करने की कोशिश की जाती है। इसलिए इसका प्रदूषण ग्रे हाइड्रोजन से कम होता है।
भारत की पहली











