वॉशिंगटन डीसी। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच अमेरिका ने एक बड़ा और रणनीतिक फैसला लिया है। अमेरिकी सरकार ने ईरान के तेल पर लगे प्रतिबंधों में 30 दिनों की अस्थायी ढील देने का ऐलान किया है। यह छूट केवल उस ईरानी तेल पर लागू होगी जो पहले से समुद्र में टैंकरों पर लदा हुआ है।
अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के मुताबिक, यह राहत 20 मार्च से लेकर 19 अप्रैल 2026 तक लागू रहेगी। इस दौरान दुनिया के बाजार में लगभग 14 करोड़ बैरल ईरानी तेल आने की संभावना है। अमेरिका का मानना है कि, इससे वैश्विक बाजार में तेल की सप्लाई बढ़ेगी और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।
अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव का सीधा असर वैश्विक तेल बाजार पर पड़ा है। पिछले कुछ हफ्तों में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल देखा गया है। ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत इस समय लगभग 112 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई है, जबकि कुछ दिन पहले यह 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी। युद्ध शुरू होने से पहले फरवरी के अंत में कच्चे तेल की कीमत करीब 70 डॉलर प्रति बैरल थी।
तेल की कीमतों में यह उछाल वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय बन गया है। तेल महंगा होने का असर सिर्फ पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता बल्कि इसका असर ट्रांसपोर्ट, खाद्य पदार्थों और कई अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ता है।
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अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने बताया कि, यह छूट केवल उस ईरानी तेल पर लागू होगी जो पहले से जहाजों में लदा हुआ है और समुद्र में मौजूद है। इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि, ईरान नए सिरे से तेल उत्पादन या निर्यात बढ़ा सकेगा। बल्कि यह केवल उस तेल को बाजार में आने की अनुमति देता है जो पहले ही शिपमेंट के रूप में भेजा जा चुका है।
बेसेंट के अनुसार, इस कदम से करीब 14 करोड़ बैरल तेल वैश्विक बाजार में उपलब्ध हो सकता है। इससे दुनिया भर में ऊर्जा की आपूर्ति बढ़ेगी और कीमतों पर बने दबाव को कम करने में मदद मिलेगी।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि, अमेरिका ने अपने विरोधी देश ईरान के तेल पर लगे प्रतिबंधों में अचानक ढील क्यों दी। दरअसल, युद्ध के कारण मिडिल ईस्ट की सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है। खास तौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने की वजह से तेल की सप्लाई पर बड़ा असर पड़ा है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। यहां से दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत पेट्रोलियम का परिवहन होता है। जब यह मार्ग असुरक्षित हो गया तो कई तेल टैंकरों ने इस रास्ते से गुजरना बंद कर दिया। इसका सीधा असर वैश्विक तेल सप्लाई पर पड़ा और कीमतें तेजी से बढ़ने लगीं। इसी संकट को देखते हुए ट्रंप प्रशासन ने अस्थायी राहत देने का फैसला किया।
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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज करीब 167 किलोमीटर लंबा समुद्री मार्ग है जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। सऊदी अरब, इराक, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात जैसे बड़े तेल निर्यातक देश इसी रास्ते से दुनिया भर में तेल भेजते हैं। भारत समेत कई एशियाई देशों की ऊर्जा जरूरतें भी काफी हद तक इसी मार्ग पर निर्भर हैं। भारत अपनी जरूरत का लगभग 50 प्रतिशत कच्चा तेल और करीब 54 प्रतिशत एलएनजी इसी रास्ते से आयात करता है। ऐसे में अगर यह मार्ग लंबे समय तक बंद रहता है तो इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
अमेरिका ने साफ किया है कि, यह फैसला ईरान के प्रति नरमी दिखाने के लिए नहीं लिया गया है। स्कॉट बेसेंट ने कहा कि यह एक रणनीतिक कदम है। उन्होंने कहा कि, अगर इस तेल को बाजार में आने की अनुमति नहीं दी जाती तो संभव है कि यह तेल चोरी-छिपे चीन को बेचा जाता। अमेरिका चाहता है कि, इस तेल को उसके सहयोगी देशों जैसे वियतनाम और थाईलैंड जैसे देशों द्वारा खरीदा जाए ताकि वैश्विक बाजार में संतुलन बना रहे।
उनका कहना है कि, अमेरिका इस रणनीति के जरिए तेल की कीमतों को नियंत्रित करना चाहता है, जबकि ईरान के खिलाफ दबाव भी बनाए रखेगा।
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यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप प्रशासन ने इस तरह का फैसला लिया है। कुछ समय पहले अमेरिका ने रूसी तेल के मामले में भी इसी तरह की अस्थायी छूट दी थी। उस समय उन रूसी टैंकरों को तेल बेचने की अनुमति दी गई थी जो पहले से समुद्र में मौजूद थे। नए लाइसेंस के तहत उन रूसी टैंकरों से तेल बेचने की अनुमति दी गई है जो 12 मार्च तक लोड हो चुके थे। हालांकि इस छूट से उत्तर कोरिया, क्यूबा और क्रीमिया को बाहर रखा गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से ईरान को कुछ आर्थिक फायदा जरूर हो सकता है, क्योंकि तेल की कीमतें काफी बढ़ चुकी हैं। हालांकि अमेरिका का दावा है कि वह अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग सिस्टम पर अपनी पकड़ बनाए रखेगा ताकि ईरान इस कमाई का पूरी तरह फायदा न उठा सके। अमेरिका का तर्क है कि, इस कदम का मकसद केवल बाजार में सप्लाई बढ़ाना है, न कि ईरान की अर्थव्यवस्था को मजबूत करना।
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अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के आंकड़ों के अनुसार, 14 करोड़ बैरल तेल दुनिया की कुल खपत के मुकाबले बहुत ज्यादा नहीं है। यह मात्रा वैश्विक मांग के हिसाब से सिर्फ डेढ़ दिन की जरूरत के बराबर है। यह राहत केवल अस्थायी है। अगर मिडिल ईस्ट में युद्ध जारी रहता है और होर्मुज जलडमरूमध्य बंद रहता है तो आने वाले समय में तेल संकट और गहरा सकता है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है। देश अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में अगर वैश्विक बाजार में 14 करोड़ बैरल अतिरिक्त तेल आता है तो इससे कीमतों पर कुछ हद तक नियंत्रण रह सकता है। इसका फायदा भारत जैसे देशों को मिल सकता है क्योंकि इससे पेट्रोल और डीजल की कीमतों में अचानक होने वाली बढ़ोतरी को रोका जा सकता है।
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ईरान पर तेल प्रतिबंधों की शुरुआत 1979 में हुई थी, जब तेहरान में अमेरिकी दूतावास के कर्मचारियों को बंधक बना लिया गया था। इसके बाद कई दशकों तक ईरान पर अलग-अलग तरह के आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाते रहे।
2015 में अमेरिका और अन्य देशों ने ईरान के साथ परमाणु समझौता किया था, जिसे जेसीपीओए कहा जाता है। इस समझौते के तहत ईरान पर लगे कई प्रतिबंध हटाए गए थे। लेकिन 2018 में तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते से बाहर निकलते हुए ईरान पर फिर से कड़े प्रतिबंध लगा दिए।