MP News:मशहूर शायर बशीर बद्र का 91 वर्ष की उम्र में निधन, भोपाल में ली अंतिम सांस

प्रीति जैन, भोपाल। उनका मशहूर शेर 'उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, ना जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए' उनकी रुख्सती के बाद और भी मार्मिक लग रहा है। बशीर बद्र ने अपनी शायरी से मोहब्बत, रिश्तों, तन्हाई और समाज की संवेदनाओं को बेहद सहज अंदाज में लोगों तक पहुंचाया। उनकी शायरी आज भी हर पीढ़ी के दिल में जिंदा है।
'अफेक्शन' किताब की यादें साझा कीं
वे मेरे लिए सायादार दरख्त थे, जिनसे अदबी तालिम ली। वे एक चीज पर बहुत जोर दिया करते थे कि शायरी कर रहे हैं, तो जुबान सहज, सरल और साफ होना चाहिए। जो लोग वजनी-किताबी शायरी करते हैं, उन पर वे एक शेर पढ़ा करते थे, ‘कागज में दब कर मर गए, कीड़े किताब के दीवाना बे-पढ़े मशहूर हो गया।’ मैंने उनकी एक किताब ‘अफेक्शन’ भी एडिट की थी। वे शायरी में आम बोलचाल की भाषा को सबसे ज्यादा अहमियत देते थे।
शायरी में सादगी को देते थे महत्व
कवि और शायर आलोक श्रीवास्तव का कहना है कि एक बार मैंने उन्हें अपनी गजल सुनाई, ‘अगर सफर में मेरा साथ मेरा यार चले, तवाफ करता हुआ मौसम-ए-बहार चले...’, तो उन्होंने कहा कि ‘तवाफ’ लफ्ज कहां से मिल गया। फिर मुस्कुराते हुए बोले कि यह तुम्हारी डिक्शन का हिस्सा नहीं है। यह उनकी खूबी थी कि वे हर शब्द को आम समझ के हिसाब से परखते थे। वे चाहते थे कि शायरी ऐसी हो जिसे साहित्य से दूर रहने वाला इंसान भी आसानी से समझ सके।

महफिलों की जान हुआ करते थे बशीर बद्र
एक वक्त था जब उनकी मौजूदगी महफिल की कामयाबी की जमानत हुआ करती थी। बशीर बद्र उन शायरों में रहे जिन्होंने उर्दू शायरी को महफिलों से निकालकर आम लोगों के दिलों तक पहुंचाया। उनकी गजलों में कठिन शब्दों की जगह रोजमर्रा की जिंदगी, रिश्तों की गर्माहट, मोहब्बत और टूटते समाज का दर्द दिखाई देता था। यही कारण था कि उनके शेर सिर्फ मुशायरों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि आम जिंदगी का हिस्सा बन गए।
ये भी पढ़ें: Delhi Rain: दिल्ली-एनसीआर में बदला मौसम का मिजाज, झमाझम बारिश से तापमान में आई गिरावट
महिलाओं के सम्मान में खड़े हो जाते थे
मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी की निदेशक डॉ. नुसरत मेहदी का कहना है कि मेरे पहले गजल संग्रह ‘मैं भी तो हूं’ की भूमिका बशीर बद्र साहब ने लिखी थी। मेरी खुशनसीबी रही कि जब मैं मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी में बतौर सचिव आई, तब वे अकादमी के अध्यक्ष हुआ करते थे। जब कभी मैं उनके केबिन में जाती, तो वे अपनी कुर्सी से खड़े हो जाते। मैं उनसे कहती कि आप खड़े न हुआ करें, लेकिन वे कहते थे, ‘मैं सम्मान में खड़ा होता हूं, तो मना न करा करिए।’

अल्फाजों में जिंदा रहेंगे बशीर बद्र
बशीर बद्र का जाना केवल एक शायर का निधन नहीं, बल्कि उर्दू अदब के एक सुनहरे दौर का अंत माना जा रहा है। उन्होंने अपनी गजलों के जरिए मोहब्बत और इंसानी रिश्तों को नई पहचान दी। उनकी शायरी ने हर वर्ग और हर उम्र के लोगों के दिलों को छुआ। आने वाले समय में भी उनके शेर और गजलें लोगों को भावनाओं से जोड़ती रहेंगी और उर्दू साहित्य में उनका नाम हमेशा सम्मान के साथ लिया जाएगा।












