एक लड़की से 700 लोगों ने हैवानियत की :ब्रिटेन की संसद में गूंजा 'पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग', क्या है पूरी सच्चाई?

लंदन। ब्रिटेन में कथित ‘ग्रूमिंग गैंग’ और बाल यौन शोषण के मामलों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। सांसद रूपर्ट लोव ने संसद में दिए भाषण में कई पीड़िताओं की गवाहियों का जिक्र करते हुए दावा किया कि वर्षों तक संगठित गिरोह नाबालिग लड़कियों का यौन शोषण करते रहे और कई संस्थाएं इसे रोकने में विफल रहीं।
कितने लोग बने गवाह, किसने किया खुलासा?
ग्रूमिंग गैंग का खुलासा ब्रिटिश सांसद रूपर्ट लोव ने किया है। उन्होंने अपनी निजी जांच का हवाला देते हुए संसद में कई पीड़िताओं की गवाहियां पेश कीं। उनके मुताबिक, 2025 में हुई जांच के दौरान ब्रिटेन के कम से कम 85 इलाकों में गैंग आधारित बाल यौन शोषण के पैटर्न सामने आए।लोव ने कई दर्दनाक बयान पढ़े। एक पीड़िता ने दावा किया कि 13 साल की उम्र से शुरू हुए शोषण के दौरान तीन साल में करीब 600–700 अलग-अलग पुरुषों ने उसके साथ दुष्कर्म किया। एक अन्य गवाही में हिंसा, धमकी और नस्लीय टिप्पणियों के आरोप लगाए गए। कुछ पीड़िताओं ने यह भी आरोप लगाया कि शिकायतों के बावजूद सिस्टम ने उनकी बात गंभीरता से नहीं सुनी।
क्या है ग्रूमिंग गैंग, कैसे काम करता है यह नेटवर्क?
ब्रिटेन में ‘ग्रूमिंग गैंग’ शब्द उन मामलों के लिए इस्तेमाल होता है, जिनमें बच्चों और किशोरियों को भरोसे में लेकर उनका यौन शोषण किया जाता है। आरोपी पहले दोस्ती, उपहार, ड्रग्स या भरोसे का इस्तेमाल करते हैं, फिर धमकी, हिंसा और ब्लैकमेल के जरिए पीड़ितों को नियंत्रण में रखते हैं।
रोदरहम, रोशडेल और ओल्डहैम जैसे शहरों में सामने आए मामलों के बाद यह शब्द व्यापक चर्चा में आया। 1990 के दशक से जुड़े कई मामलों में हजारों पीड़ित सामने आने का दावा किया गया है।
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पाकिस्तानी कनेक्शन आया सामने
सरकारी जांचों और सांसद के भाषण में यह दावा किया गया कि कई मामलों में आरोपी पाकिस्तानी मूल के पुरुष थे, जिनमें टैक्सी ड्राइवर, दुकानदार और स्थानीय नेटवर्क से जुड़े लोग शामिल बताए गए। हालांकि, यह भी ध्यान देने वाली बात है कि ब्रिटेन में अलग-अलग ग्रूमिंग मामलों में आरोपी विभिन्न पृष्ठभूमियों से रहे हैं। लेकिन रोदरहम और कुछ अन्य चर्चित मामलों में पाकिस्तानी मूल के आरोपियों की बड़ी संख्या को लेकर बहस और राजनीतिक विवाद लगातार बना हुआ है।
नस्लीय भेदभाव के कारण जांच में देरी
यह विवाद सिर्फ अपराध का मामला नहीं, बल्कि पुलिस, सामाजिक सेवाओं और सरकारी संस्थाओं की भूमिका पर भी सवाल खड़े करता है। आलोचकों का आरोप है कि नस्लीय या सामाजिक संवेदनशीलता के डर से कई शिकायतों पर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई। इसी वजह से ब्रिटेन में अब इस मुद्दे पर सख्त जांच, जवाबदेही और पीड़ितों को न्याय दिलाने की मांग फिर तेज हो गई है।











