अमेरिका की हिंदू नेता तुलसी गबार्ड ने छोड़ी कुर्सी,ट्रप बोले- उनकी कमी हमेशा खलेगी

अमेरिका की राजनीति और सुरक्षा तंत्र से जुड़ी बड़ी खबर सामने आई है। अमेरिका की नेशनल इंटेलिजेंस डायरेक्टर तुलसी गबार्ड ने अपने पद से इस्तीफा देने का फैसला कर लिया है। उन्होंने अपने इस्तीफे की वजह पति अब्राहम विलियम्स की कंभीर बीमारी को बताया है। जानकारी के मुताबिक, उनके पति को हाल ही में बोन कैंसर होने का पता चला है, जिसके बाद गबार्ड ने परिवार को प्राथमिकता देने का फैसला लिया।
तुलसी गबार्ड ने अपने त्यागपत्र में लिखा कि उनके पति हमेशा हर मुश्किल वक्त में उनके साथ खड़े रहे हैं और अब जब वह जिंदगी की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रहे हैं, तब उनका साथ देना उनकी जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि वह ऐसे समय में इस बेहद जिम्मेदार और समय लेने वाले पद पर बने नहीं रह सकतीं। गबार्ड का इस्तीफा 30 जून से प्रभावी होगा। उनके इस्तीफे के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया दी और कहा कि तुलसी गबार्ड ने अपने कार्यकाल में शानदार काम किया है। ट्रंप ने लिखा कि वह इस समय अपने पति के साथ रहना चाहती हैं। मुझे भरोसा है कि उनका पति जल्द स्वस्थ होकर पहले से बेहतर हालत में लौटेगा। हमें तुलसी की कमी महसूस होगी।
ट्रंप सरकार में बढ़ी हलचल
तुलसी गबार्ड का इस्तीफा ऐसे समय आया है जब ट्रंप प्रशासन पहले से कई बड़े बदलावों से गुजर रहा है। गबार्ड ट्रंप सरकार छोड़ने वाली चौथी कैबिनेट स्तर की नेता बन गई हैं। इससे पहले श्रम मंत्री लोरी चावेज-डीरेमर, होमलैंड सिक्योरिटी प्रमुख क्रिस्टी नोएम और अटॉर्नी जनरल पाम बॉन्डी भी प्रशासन से अलग हो चुकी हैं। व्हाइट हाउस ने जानकारी दी है कि प्रिंसिपल डिप्टी डायरेक्टर एरॉन लुकास फिलहाल कार्यवाहक नेशनल इंटेलिजेंस डायरेक्टर की जिम्मेदारी संभालेंगे। 2024 के राष्ट्रपति चुनाव अभियान के दौरान गबार्ड ने ट्रंप का समर्थन किया था। 2025 में ट्रंप के व्हाइट हाउस लौटने के कुछ ही हफ्तों के बाद उन्हें अमेरिकी खुफिया तंत्र की सबसे शक्तिशाली हस्तियों में शामिल किया गया था।
ईरान मुद्दे पर ट्रंप और गबार्ड के बीच दिखा मतभेद
हाल के महीनों में तुलसी गबार्ड और ट्रंप प्रशासन के बीच विदेश नीति को लेकर मतभेद भी चर्चा में रहे। खासतौर पर ईरान को लेकर दोनों के विचार अलग दिखाई दिए। जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाया, तब गबार्ड ने सार्वजनिक तौर पर खुलकर समर्थन नहीं किया। कांग्रेस की सुनवाई के दौरान भी उन्होंने ईरान की परमाणु क्षमता पर सीधे जवाब देने से बचने की कोशिश की थी। पिछले साल गबार्ड ने कहा था कि ईरान फिलहाल परमाणु हथियार बनाने की दिशा में सक्रिय नहीं है। हालांकि ट्रंप ने उनके बयान को सार्वजनिक रूप से खारिज कर दिया था। ट्रंप ने उस वक्त कहा था कि मुझे फर्क नहीं पड़ता कि उन्होंने क्या कहा। मुझे लगता है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने के बेहद करीब था। इसके बाद से माना जा रहा था कि ट्रंप प्रशासन और गबार्ड के बीच विदेश नीति को लेकर अंदरूनी तनाव बढ़ रहा है। हालांकि इस्तीफे के बाद भी गबार्ड ने ट्रंप के फैसलों का सम्मान करते हुए कहा कि राष्ट्रपति ही तय करते हैं कि देश के लिए कौन सा खतरा तत्काल है।
विदेशी युद्धों के विरोध से बनाई अलग पहचान
तुलसी गबार्ड अमेरिकी राजनीति में उन नेताओं में गिनी जाती हैं जिन्होंने विदेशों में अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप का लगातार विरोध किया। उन्होंने इराक युद्ध से लेकर मध्य पूर्व में अमेरिकी दखल तक कई मुद्दों पर खुलकर राय रखी। इराक में मेडिकल यूनिट के साथ सेवा दे चुकी गबार्ड खुद सेना का हिस्सा रह चुकी हैं। 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में भी उन्होंने विदेशी युद्धों में अमेरिकी भागीदारी को बड़ा मुद्दा बनाया था।
21 साल की उम्र में बनी थीं विधायक
तुलसी गबार्ड का राजनीतिक सफर भी काफी दिलचस्प रहा है। वह 2002 में सिर्फ 21 साल की उम्र में हवाई राज्य विधानसभा के लिए चुनी गई थीं। उस समय वह सबसे कम उम्र की विधायक बनी थीं। बाद में उनकी नेशनल गार्ड यूनिट को इराक भेजा गया, जिसके चलते उन्होंने अपना पद छोड़ दिया। इसके बाद 2013 से 2021 तक वह डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से अमेरिकी कांग्रेस की सदस्य रहीं। वह अमेरिकी कांग्रेस में पहुंचने वाली पहली हिंदू सांसद भी बनीं। भारतीय मूल और हिंदू पहचान की वजह से भारत में भी उनकी काफी चर्चा होती रही है।
डेमोक्रेटिक पार्टी छोड़ी, फिर ट्रंप की करीबी बनीं
तुलसी गबार्ड ने 2022 में डेमोक्रेटिक पार्टी छोड़ दी थी। उन्होंने अपनी पूर्व पार्टी पर हमला बोलते हुए उसे 'युद्ध समर्थक और कट्टर वोक राजनीति से प्रभावित' बताया था। इसके बाद उन्होंने मीडिया में राजनीतिक टिप्पणीकार के तौर पर काम किया और धीरे-धीरे ट्रंप की समर्थक बन गईं। 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने खुलकर ट्रंप का समर्थन किया और चुनाव प्रचार में भी हिस्सा लिया। ट्रंप की जीत के बाद वह ट्रांजिशन टीम में शामिल हुईं और बाद में उन्हें अमेरिका के सबसे अहम खुफिया पदों में से एक नेशनल इंटेलिजेंस डायरेक्टर बनाया गया।
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खुफिया एजेंसियों में बड़े बदलावों की वजह से भी रहीं चर्चा में
अपने कार्यकाल के दौरान तुलसी गबार्ड ने अमेरिकी खुफिया तंत्र में बड़े बदलाव शुरू किए थे। उन्होंने एजेंसियों को जरूरत से ज्यादा बड़ा और अक्षम बताते हुए कर्मचारियों की संख्या में भारी कटौती की योजना पेश की थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले साल उन्होंने एजेंसी में करीब 50 फीसदी कर्मचारियों की कटौती का प्रस्ताव रखा था। इस फैसले को लेकर अमेरिका में काफी बहस भी हुई थी। अब उनके इस्तीफे के बाद अमेरिकी राजनीति में यह चर्चा तेज हो गई है कि ट्रंप प्रशासन में आगे और कौन से बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।












