ट्राइकोटिलोमेनिया के रेयर केस ने चौंकाया!उल्टी में निकलने लगे बाल, जांच में सामने आया दिमागी कनेक्शन

प्रवीण श्रीवास्तव, भोपाल। खातेगांव से आई 16 साल की एक किशोरी लंबे समय से पेट दर्द और लगातार उल्टियों की समस्या से जूझ रही थी। शुरुआत में परिवार ने इसे सामान्य बीमारी समझकर डर्मेटोलॉजिस्ट समेत कई डॉक्टरों को दिखाया लेकिन असली कारण सामने नहीं आया। मामला तब गंभीर हुआ जब उल्टी में बाल निकलने लगे। इसके बाद भोपाल में विशेषज्ञों से जांच कराई गई जहां यह स्पष्ट हुआ कि यह गैस्ट्रिक या स्किन से जुड़ी समस्या नहीं बल्कि ट्राइकोटिलोमेनिया नाम का एक दुर्लभ मानसिक विकार है। डॉक्टरों के मुताबिक यह एक बॉडी-फोकस्ड रिपिटेटिव बिहेवियर है जिसमें व्यक्ति खुद अपने बाल खींचता है और कई बार उन्हें निगल भी लेता है। इस दौरान उसे अस्थायी राहत महसूस होती है जिससे यह आदत धीरे-धीरे ऑटोमैटिक व्यवहार में बदल जाती है। इसे इंपल्स कंट्रोल डिसऑर्डर भी माना जाता है जिसमें व्यक्ति अपने इमोशंस पर नियंत्रण नहीं रख पाता। परिजनों के डर से किशोरी यह सब छिपकर करने लगी थी।
क्यों होता है ट्राइकोटिलोमेनिया
जेपी अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ. राहुल शर्मा बताते हैं कि यह समस्या केवल व्यवहारिक नहीं बल्कि न्यूरोबायोलॉजिकल स्तर से भी जुड़ी होती है। दिमाग में डोपामिन, सेरोटोनिन और ग्लूटामेट जैसे न्यूरोट्रांसमीटर का असंतुलन इस आदत को ट्रिगर करता है। सेरोटोनिन की कमी चिंता और इंपल्स कंट्रोल को प्रभावित करती है जबकि डोपामिन दिमाग के रिवार्ड सिस्टम को सक्रिय कर बाल खींचने पर अस्थायी सुकून देता है। बार-बार ऐसा होने पर दिमाग इसे राहत पाने के तरीके के रूप में सीख लेता है और यह आदत स्थायी बन जाती है।
एक तरफ गंजेपन से खुला दूसरा केस
इसी तरह सागर से आई 22 वर्षीय कॉलेज छात्रा के सिर में अचानक एक तरफ गंजे पैच बनने लगे। शुरुआत में इसे स्किन डिजीज समझा गया लेकिन बालों के असमान टूटने और व्यवहार में बदलाव ने असली वजह उजागर कर दी। छात्रा खुद अपने बाल खींच रही थी लेकिन इसे छिपाने के लिए उसने हेयर स्टाइल बदल ली, कैप पहनना शुरू कर दिया और धीरे-धीरे लोगों से दूरी बनाने लगी। इससे उसका आत्मविश्वास गिरने लगा और वह सामाजिक रूप से अलग-थलग पड़ गई जिससे मानसिक स्थिति और बिगड़ती चली गई।
सिर्फ बाल झड़ना नहीं, गंभीर हो सकते हैं असर
ट्राइकोटिलोमेनिया का असर सिर्फ बाल झड़ने तक सीमित नहीं रहता। अगर मरीज बाल निगलने लगे तो पेट में ट्राइकोबेजोआर यानी हेयर बॉल बन सकती है जो पाचन तंत्र को ब्लॉक कर देती है। कई मामलों में इसे हटाने के लिए सर्जरी तक करनी पड़ती है। इसके अलावा लगातार बाल खींचने से स्थायी गंजापन हो सकता है। मानसिक रूप से यह समस्या आत्मविश्वास में कमी, डिप्रेशन और सोशल एंग्जायटी को बढ़ा देती है। कई मरीज इस व्यवहार को छिपाने के लिए खुद को समाज से दूर कर लेते हैं जिससे स्थिति और जटिल हो जाती है।
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बच्चों को कैसे बचाएं, क्या रखें ध्यान
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की समस्या से बचाव के लिए परिवार की भूमिका बेहद अहम होती है। बच्चों से रोज खुलकर बातचीत करना जरूरी है ताकि उनकी भावनाएं समझी जा सकें। पढ़ाई या प्रदर्शन का अत्यधिक दबाव न बनाया जाए और उनके व्यवहार में छोटे-छोटे बदलावों पर ध्यान रखा जाए। बच्चों को अकेलेपन और सामाजिक दूरी से बचाने की कोशिश करनी चाहिए। अगर जरूरत लगे तो समय रहते मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए। साथ ही बच्चों को स्ट्रेस मैनेजमेंट और अपनी भावनाएं सही तरीके से व्यक्त करने के तरीके सिखाना भी जरूरी है।
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सही इलाज से संभव है सुधार
वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी के मुताबिक ट्राइकोटिलोमेनिया एक ऐसा इंपल्स कंट्रोल डिसऑर्डर है जिसमें मरीज को बाल खींचने की इच्छा को रोकना मुश्किल हो जाता है। सही समय पर काउंसलिंग और थेरेपी से इसे कंट्रोल किया जा सकता है। वे बताते हैं कि अक्सर बच्चे अपनी परेशानी शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते और ऐसे व्यवहार के जरिए तनाव निकालते हैं। अगर समय रहते पहचान हो जाए और परिवार का सहयोग मिले तो इस समस्या से पूरी तरह बाहर निकला जा सकता है।












