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ट्रांसजेंडर बिल लोकसभा से पारित :अधिकारों की सुरक्षा या पहचान पर सवाल? विपक्ष क्यों बता रहा इसे खतरनाक

लोकसभा ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक 2026 पारित कर दिया है। अब ट्रांसजेंडर पहचान के लिए मेडिकल बोर्ड की जांच जरूरी होगी। सरकार का कहना है कि इससे सुरक्षा बढ़ेगी, जबकि विपक्ष और ट्रांसजेंडर समुदाय इसे अधिकारों पर हमला बता रहे हैं। जानिए इस बिल के प्रावधान, विवाद और इसके संभावित प्रभाव।
अधिकारों की सुरक्षा या पहचान पर सवाल? विपक्ष क्यों बता रहा इसे खतरनाक
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    नई दिल्ली। भारत की संसद में ट्रांसजेंडर समुदाय से जुड़े अधिकारों को लेकर एक बड़ा और विवादित फैसला सामने आया है। लोकसभा ने मंगलवार को ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026’ को ध्वनिमत से पारित कर दिया। सरकार का कहना है कि, इस संशोधन का उद्देश्य ट्रांसजेंडर समुदाय को कानूनी सुरक्षा और स्पष्ट पहचान देना है। वहीं विपक्षी दलों और ट्रांसजेंडर अधिकार कार्यकर्ताओं ने इसे समुदाय के अधिकारों पर हमला बताते हुए विरोध जताया है।

    सबसे बड़ा बदलाव यह है कि, अब ट्रांसजेंडर पहचान के लिए मेडिकल बोर्ड की जांच अनिवार्य होगी, जबकि 2019 के कानून में व्यक्ति खुद अपनी पहचान घोषित कर सकता था।

    2019 के कानून से कैसे अलग है नया संशोधन

    2019 में लागू ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम के तहत किसी भी व्यक्ति को अपनी पहचान स्वयं तय करने का अधिकार था।

    इस कानून के अनुसार-

    • कोई भी व्यक्ति खुद को ट्रांसजेंडर घोषित कर सकता था।
    • इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट (DM) द्वारा प्रमाण पत्र जारी किया जाता था।
    • इसके लिए मेडिकल जांच जरूरी नहीं थी।

    लेकिन 2026 के संशोधन में यह व्यवस्था बदल दी गई है।

    अब नए नियमों के अनुसार-

    • मेडिकल बोर्ड की जांच अनिवार्य होगी।
    • मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर DM प्रमाण पत्र जारी करेंगे।
    • स्वयं पहचान की घोषणा का अधिकार सीमित कर दिया गया है।
    • यही बदलाव इस बिल को सबसे ज्यादा विवादित बना रहा है।

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    सरकार का क्या है तर्क

    केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार ने लोकसभा में बिल पर चर्चा का जवाब देते हुए कहा कि, यह संशोधन किसी समुदाय के खिलाफ नहीं है, बल्कि उनके अधिकारों की रक्षा के लिए लाया गया है। उन्होंने कहा कि कई लोग जैविक कारणों से समाज में भेदभाव और बहिष्कार का सामना करते हैं। ऐसे में सरकार का उद्देश्य है कि ट्रांसजेंडर समुदाय को कानूनी पहचान और सुरक्षा दोनों मिलें। मंत्री ने यह भी कहा कि नए कानून से अपराधों के खिलाफ सख्त कार्रवाई संभव होगी और समुदाय को बेहतर सुरक्षा मिलेगी।

    अब अपराधों पर मिलेगी कड़ी सजा

    नए संशोधन में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के खिलाफ अपराधों को लेकर भी कड़े प्रावधान किए गए हैं।

    कानून

    अधिकतम सजा

    2019 का कानून

    2 साल तक

    संशोधन विधेयक 2026

    14 साल तक

    सरकार के अनुसार, यह बदलाव ट्रांसजेंडर समुदाय के खिलाफ हिंसा और उत्पीड़न को रोकने के लिए किया गया है।

    नए बिल के प्रमुख प्रावधान

    संशोधन विधेयक में कई अहम बदलाव किए गए हैं।

    प्रमुख प्रावधान

    • ट्रांसजेंडर की पहचान के लिए मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट अनिवार्य।
    • स्वयं पहचान की घोषणा का अधिकार सीमित।
    • ट्रांसजेंडर की परिभाषा में बदलाव।
    • समुदाय के खिलाफ अपराधों पर अधिकतम 14 साल की सजा।
    • जबरन किसी को ट्रांसजेंडर बनाने पर भी सख्त दंड।

    सरकार का दावा है कि, इन प्रावधानों से कानूनी स्पष्टता आएगी और दुरुपयोग की संभावना कम होगी।

    ट्रांसजेंडर समुदाय क्यों कर रहा विरोध

    इस बिल का सबसे बड़ा विरोध ट्रांसजेंडर समुदाय और अधिकार कार्यकर्ताओं की ओर से हो रहा है। उनका कहना है कि, यह कानून स्वयं पहचान के अधिकार को खत्म करता है, जो कि मानव अधिकारों के खिलाफ है। समुदाय के लोगों का कहना है कि, मेडिकल जांच अनिवार्य करना अमानवीय है। पहचान तय करने का अधिकार व्यक्ति का होना चाहिए, इससे लाखों लोग ट्रांसजेंडर श्रेणी से बाहर हो सकते हैं। दिल्ली के प्रेस क्लब में आयोजित एक जन सुनवाई में भी इस विधेयक को वापस लेने की मांग की गई।

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    क्या था सुप्रीम कोर्ट का फैसला

    इस विवाद की एक बड़ी वजह सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला भी है। 2014 में NALSA बनाम भारत संघ केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि, लैंगिक पहचान व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। कोई भी व्यक्ति खुद तय कर सकता है कि वह पुरुष, महिला या ट्रांसजेंडर है। इसके लिए मेडिकल जांच जरूरी नहीं है। इसी फैसले के आधार पर कई लोग कह रहे हैं कि नया संशोधन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ है।

    विपक्ष ने बिल को बताया खतरनाक

    विपक्षी दलों ने संसद के भीतर और बाहर इस बिल का विरोध किया। लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने इस विधेयक को ट्रांसजेंडर समुदाय के संवैधानिक अधिकारों पर हमला बताया। उन्होंने कहा कि, यह बिल ट्रांसजेंडर लोगों से उनकी पहचान तय करने का अधिकार छीन रहा है। राहुल गांधी ने यह भी कहा कि, सरकार अपने संकीर्ण विचारों को लागू कर रही है और यह देश की समृद्ध परंपरा के खिलाफ है। इस दौरान उन्होंने ट्रांसजेंडर समुदाय के प्रतिनिधियों से मुलाकात भी की, जिसमें प्रियंका गांधी वाड्रा भी मौजूद थीं।

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    संसद में धार्मिक और पौराणिक उदाहरण

    इस बिल पर चर्चा के दौरान कई सांसदों ने भारतीय परंपरा और पौराणिक कथाओं का भी उल्लेख किया। तेलुगु देशम पार्टी की सांसद डॉ. बी. शबरी ने रामायण की एक कथा का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि, जब भगवान राम वनवास के लिए जा रहे थे तो उन्होंने पुरुषों और महिलाओं को लौटने का आदेश दिया था। लेकिन कुछ लोग वहीं खड़े रहे क्योंकि वे खुद को इन दोनों श्रेणियों में नहीं मानते थे। जब राम वनवास से लौटे तो उन्होंने उन लोगों को आशीर्वाद दिया। सांसद ने कहा कि यही किन्नर समुदाय की परंपरा का प्रतीक है।

    महाभारत और मोहिनी का भी हुआ जिक्र

    संसद में चर्चा के दौरान महाभारत और पुराणों के कई उदाहरण दिए गए। कांग्रेस सांसद गोवाल पडवी ने महाभारत में अर्जुन के बृहन्नला रूप और भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में लैंगिक विविधता को स्वीकार किया गया है। इसलिए कानून बनाते समय समुदाय से बातचीत जरूरी है।

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    विपक्ष की मांग- स्थायी समिति को भेजा जाए बिल

    कई विपक्षी सांसदों ने मांग की कि इस विधेयक को सीधे पास करने के बजाय संसद की स्थायी समिति को भेजा जाना चाहिए। विरोध करने वाले सांसदों में शामिल थे-

    • सुप्रिया सुले
    • एस जोतिमणि
    • आनंद भदौरिया
    • टी सुमथि

    इनका कहना था कि इतना संवेदनशील कानून बिना व्यापक चर्चा के पारित नहीं किया जाना चाहिए।

    ट्रांसजेंडर समुदाय की मुख्य चिंताएं

    समुदाय के लोगों का कहना है कि नए कानून से कई समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

    प्रमुख चिंताएं

    • मेडिकल बोर्ड द्वारा जांच को अपमानजनक बताया जा रहा है।
    • पहचान के अधिकार पर सरकारी नियंत्रण बढ़ेगा।
    • लाखों लोग कानूनी पहचान से वंचित हो सकते हैं।
    • सामाजिक भेदभाव और बढ़ सकता है।

    ट्रांसजेंडर अधिकार कार्यकर्ता ग्रेस बानू ने कहा कि यह प्रस्तावित बदलाव वर्षों की प्रगति को कमजोर कर सकते हैं।

    Manisha Dhanwani
    By Manisha Dhanwani

    मनीषा धनवानी | जागरण लेकसिटी यूनिवर्सिटी से BJMC | 6 वर्षों के पत्रकारिता अनुभव में सब-एडिटर, एंकर, ...Read More

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