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सुप्रीम कोर्ट ने पूछा :मूर्ति छूना ईश्वर का अपमान कैसे, सबरीमाला पक्ष बोला- भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी, इसलिए परंपराएं वैसी

सुनवाई के दौरान जस्टिस ने यह भी पूछा कि आधुनिक समय में, जब शिक्षा और विचारों का विस्तार हुआ है, तो क्या धार्मिक प्रथाओं को पूरी तरह तर्क से परे माना जा सकता है।
मूर्ति छूना ईश्वर का अपमान कैसे, सबरीमाला पक्ष बोला- भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी, इसलिए परंपराएं वैसी

नई दिल्ली। सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक प्रथाओं से जुड़े विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। नौ जजों की संवैधानिक पीठ इस मामले के साथ-साथ धार्मिक आस्था से जुड़े 66 अन्य मामलों पर भी विचार कर रही है। फैसला जल्द आने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि कोर्ट अब तक कई सुनवाई कर चुका लेकिन अंतिम परिणाम अब भी सामने आना बाकि है।

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद महिलाओं 10 से 50 वर्ष आयु वर्ग के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश को लेकर है। 1991 में केरल हाईकोर्ट ने इस आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगा दी थी। बाद में 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रतिबंध को हटा दिया। इसके खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं, जिन पर अब फिर से सुनवाई हो रही है।

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किसी व्यक्ति को जन्म के आधार पर देवता को छूने से कैसे रोक सकते?

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए। जस्टिस ने पूछा कि किसी भक्त को केवल उसके जन्म, वंश या जैविक कारणों के आधार पर देवता को छूने से रोकना क्या संविधान के मूल अधिकारों का उल्लंघन नहीं है। कोर्ट ने यह भी सवाल किया कि “मूर्ति को छूना ईश्वर का अपमान कैसे हो सकता है?” इस पर न्यायाधीशों ने संकेत दिया कि अगर किसी आस्थावान व्यक्ति को भेदभाव का सामना करना पड़ता है, तो क्या संविधान उसकी रक्षा के लिए आगे नहीं आएगा।

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मंदिर पक्ष की दलील क्या है?

सबरीमाला मंदिर की ओर से पेश वकील एडवोकेट गिरी ने कहा कि मंदिरों के रीति-रिवाज उस धर्म का अभिन्न हिस्सा होते हैं और इनमें हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। उन्होंने बताया कि भगवान अयप्पा ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ माने जाते हैं, इसलिए मंदिर की परंपराएं उसी आधार पर तय की गई हैं। उनके अनुसार, पूजा-पद्धति देवता की प्रकृति के अनुरूप ही होनी चाहिए।

वकील ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति का हिंदू होना केवल मंदिर जाने पर निर्भर नहीं करता। कई लोग बिना मंदिर जाए भी अपने धर्म का पालन करते हैं। इसलिए जो व्यक्ति मंदिर जाता है, उसे वहां की परंपराओं का पालन करना होगा, जो संविधान के अनुच्छेद 25(1) के तहत संरक्षित हैं।

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जस्टिस ने ये सवाल भी पूछे

सुनवाई के दौरान जस्टिस ने यह भी पूछा कि आधुनिक समय में, जब शिक्षा और विचारों का विस्तार हुआ है, तो क्या धार्मिक प्रथाओं को पूरी तरह तर्क से परे माना जा सकता है। साथ ही, अगर किसी संप्रदाय के भीतर ही किसी प्रथा को लेकर मतभेद हों, तो ऐसी स्थिति में अदालत की भूमिका क्या होगी।

7 अप्रैल से शुरू हुई इस सुनवाई में केंद्र सरकार ने भी परंपराओं के समर्थन में दलील दी है। सरकार का कहना है कि जैसे कुछ मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश पर रोक है, वैसे ही कुछ देवी मंदिरों में पुरुषों का प्रवेश भी प्रतिबंधित है, इसलिए धार्मिक मान्यताओं का सम्मान किया जाना चाहिए।

Aakash Waghmare
By Aakash Waghmare

आकाश वाघमारे | MCU, भोपाल से स्नातक और फिर मास्टर्स | मल्टीमीडिया प्रोड्यूसर के तौर पर 3 वर्षों का क...

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