नेशनल डेस्क। 22 अप्रैल 2025 की दोपहर पहलगाम की बैसरन घाटी में सब कुछ सामान्य था। पर्यटक घोड़े की सवारी कर रहे थे, परिवार हंसी-खुशी के पल बिता रहे थे और प्रकृति की गोद में सुकून तलाश रहे थे। तभी अचानक घने देवदार के जंगलों से निकले आतंकियों ने हमला कर दिया। घातक हथियारों से अंधाधुंध गोलीबारी शुरू हो गई। लोगों को संभलने का मौका भी नहीं मिला और देखते ही देखते खुशियों का माहौल चीख-पुकार में बदल गया।

इस हमले की सबसे भयावह बात यह थी कि आतंकियों ने लोगों की धार्मिक पहचान पूछकर उन्हें निशाना बनाया। निर्दोष पर्यटकों को चुन-चुनकर गोली मारी गई। इस हमले में 25 पर्यटक और एक स्थानीय घोड़ा चालक की जान चली गई, सभी पर्यटक हिंदू थे। यह घटना केवल एक आतंकी हमला नहीं, बल्कि इंसानियत पर हमला बन गई, जिसने पूरे देश को गुस्से और शोक में डुबो दिया।
बैसरन घाटी, जिसे ‘मिनी स्विट्जरलैंड’ कहा जाता है, उस दिन खून से लाल हो गई थी। जिस जगह पर लोग तस्वीरें खींचते थे, वहीं लाशें बिछ गईं। इस घटना ने न केवल कश्मीर की छवि को झटका दिया, बल्कि पर्यटन पर भी गहरा असर डाला। पूरे देश में इस घटना की चर्चा हुई और लोगों ने आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने की मांग की।
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पहलगाम हमले के बाद सरकार ने इस क्षेत्र में मौजूदा सुरक्षा खतरों के कारण 48 टूरिस्ट स्पॉट को बंद कर दिया गया था। इनमें से ज़्यादातर स्थल पहाड़ों के ऊपरी भागों में स्थित थे। कड़े सुरक्षा उपायों के कारण कश्मीर घाटी में पिछले साल का पर्यटन सीजन पूरी तरह से खत्म हो गया था। सितंबर 2025 में, सरकार ने चरणबद्ध तरीके से उन 48 टूरिस्ट स्पॉट में से 29 को फिर से खोल दिया। इस साल फरवरी में 14 और रिसॉर्ट्स खोले गए हैं।
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हमले के तुरंत बाद प्रशासन ने सुरक्षा कारणों से बैसरन घाटी को बंद कर दिया। पर्यटकों की आवाजाही पर रोक लगा दी गई और इलाके में भारी सुरक्षा बल तैनात कर दिए गए। इसका सीधा असर स्थानीय लोगों की आजीविका पर पड़ा। पहलगाम का पर्यटन उद्योग, जो हजारों लोगों की रोजी-रोटी का जरिया था, अचानक ठप हो गया। बंद का असर स्थानीय पर्यटन कारोबारियों पर एक साल बाद भी देखा जा सकता है।
बैसरन में पोनी वालों की कमाई अब घटकर तकरीबन 20-30% रह गई है। पोनी वालों के अनुसार बैसरन घाटी, डिनो घाटी, डोबयान घाटी और कश्मीर घाटी के पर्यटन स्थल पहलगाम शहर से अलग-अलग दिशाओं में लगभग 5-18 किलोमीटर की दूरी पर हैं। यहां जाने के लिए पर्यटक टट्टू किराए पर लेते हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार हमले के बाद पर्यटन उद्योग को भारी नुकसान पहुंचा है, और पोनी वालों को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ रहा है। वे पहले दिन के 1000-1500 रुपए कमा लेते थे, अब दिन के 200 से 300 रुपए ही कमा पाते हैं। आसपास के गांवों से लगभग 3,000 रजिस्टर्ड पोनी वाले हैं।
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हमले के एक साल बाद भी बैसरन घाटी पूरी तरह पर्यटकों के लिए नहीं खुली है। केवल सीमित क्षेत्र तक ही जाने की अनुमति है, जबकि आगे बैरिकेड लगाकर रास्ता बंद कर दिया गया है। सुरक्षा बल हर समय निगरानी कर रहे हैं। कई पर्यटक यहां आते हैं, लेकिन पूरी घाटी न देख पाने के कारण निराश होकर लौट जाते हैं।
इस हमले का असर केवल पोनीवालों तक सीमित नहीं रहा। होटल मालिक, टैक्सी चालक, दुकानदार और गाइड सभी प्रभावित हुए। पिछले साल पर्यटकों की संख्या में भारी गिरावट आई थी। कई होटल खाली पड़े रहे और व्यापारियों को नुकसान उठाना पड़ा। स्थानीय अर्थव्यवस्था पूरी तरह पर्यटन पर निर्भर होने के कारण यह झटका काफी बड़ा था।
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हालांकि अब हालात धीरे-धीरे सुधर रहे हैं। इस साल पहलगाम में पर्यटकों की संख्या बढ़ी है और होटल बुकिंग बढ़ रही है। पर्यटक सुरक्षा व्यवस्था पर भरोसा जता रहे हैं और कश्मीर की खूबसूरती का आनंद लेने के लिए फिर से यहां आ रहे हैं। यह बदलाव स्थानीय लोगों के लिए उम्मीद की किरण बनकर सामने आया है। हालांकि ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है।
प्रशासन ने सुरक्षा को लेकर सख्त कदम उठाए हैं। QR कोड आधारित डिजिटल पहचान प्रणाली लागू की गई है, जिससे हर टूरिस्ट सर्विस प्रोवाइडर की जानकारी तुरंत मिल जाती है। CCTV कैमरे, फेस रिकग्निशन सिस्टम और GPS ट्रैकिंग जैसे उपायों से सुरक्षा को और मजबूत किया गया है। हर पर्यटक गतिविधि पर कड़ी नजर रखी जा रही है।
सरकार बैसरन घाटी को चरणबद्ध तरीके से खोलने की योजना बना रही है। इसके साथ ही घाटी तक नई सड़क बनाने की योजना भी तैयार की जा रही है, ताकि आपात स्थिति में तुरंत सहायता पहुंचाई जा सके। प्रशासन का कहना है कि सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा, लेकिन पर्यटन को भी पुनर्जीवित करना जरूरी है।

हमले में मारे गए लोगों की याद में पहलगाम में ‘शहीद मार्ग’ स्मारक बनाया गया है। यह लिद्दर नदी के किनारे स्थित है और अब श्रद्धांजलि देने का प्रमुख स्थान बन गया है। बरसी के मौके पर यहां बड़ी संख्या में लोग पहुंचकर श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे और उन मासूम जिंदगियों को याद करेंगे, जो इस हमले में खो गईं।
एक साल पहले जहां चीख-पुकार और डर का माहौल था, वहीं आज उम्मीद और विश्वास की नई शुरुआत दिख रही है। श्रीनगर के ट्यूलिप गार्डन में उमड़ी भीड़ इस बात का संकेत है कि कश्मीर धीरे-धीरे पटरी पर लौट रहा है। यहां बीते महीने दो लाख से ज्यादा पर्यटक पहुंचे। स्थानीय लोग और प्रशासन मिलकर पहलगाम के जख्म को भरने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि आने वाले समय में यह घाटी फिर से खुशियों और सैलानियों की चहल-पहल से भर सके।