सुप्रीम कोर्ट ने DMK को फटकारा, कहा- मुख्यमंत्री की यात्राओं को कोर्ट कंट्रोल नहीं कर सकती

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय की करूर यात्रा पर रोक लगाने और उनके सार्वजनिक बयानों को नियंत्रित करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि न्यायपालिका कार्यपालिका के प्रमुख यानी मुख्यमंत्री के दौरे या कार्यक्रम को नियंत्रित नहीं कर सकती। जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने द्रमुक (DMK) की याचिका पर कड़ी टिप्पणी करते हुए पूछा कि क्या सर्वोच्च अदालत को राजनीतिक मंच बनाया जा सकता है।
मुख्यमंत्री की यात्रा को लेकर उठाया था सवाल
दरअसल, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय 10 जुलाई को करूर भगदड़ में जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों और घायलों से मिलने वाले हैं। इस दौरान उनके द्वारा सरकारी सहायता, अनुग्रह राशि, अनुकंपा नियुक्ति और अन्य राहत देने की योजना है। DMK ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर मांग की थी कि सीबीआई जांच पूरी होने तक मुख्यमंत्री, राज्य के मंत्री और अन्य संबंधित लोग इस मामले पर सार्वजनिक बयान न दें और पीड़ित परिवारों से उनके संपर्क को भी विनियमित किया जाए। पार्टी का तर्क था कि इससे निष्पक्ष जांच प्रभावित हो सकती है।
कोर्ट ने पूछा- क्या सीएम का कार्यक्रम भी तय करें?
सुनवाई के दौरान DMK की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार ने दलील दी कि तमिलगा वेत्री कषगम (TVK) के नेताओं और मंत्रियों के सार्वजनिक बयान पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए सीबीआई जांच के आदेश की भावना के विपरीत हैं। इस पर जस्टिस केवी विश्वनाथन ने तीखी टिप्पणी करते हुए पूछा, क्या आप चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट मुख्यमंत्री की यात्रा को नियंत्रित करे और उनका कार्यक्रम तय करे? यह कैसे संभव है? अदालत ने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री इस मामले में आरोपी नहीं हैं, इसलिए उनके दौरे पर रोक लगाने का कोई आधार नजर नहीं आता।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी टिप्पणी
जब DMK ने यह मांग दोहराई कि मुख्यमंत्री और मंत्री मामले पर सार्वजनिक टिप्पणी न करें, तब अदालत ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा उठाया। पीठ ने कहा कि क्या अदालत किसी के बोलने के अधिकार पर रोक लगा दे? यदि कोई राजनीतिक दल कोई बयान देता है तो दूसरा दल उसका राजनीतिक जवाब दे सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी चल रही जांच के दौरान राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी स्वयं को पक्षकार बनाकर इस प्रकार की मांग नहीं कर सकते। न्यायालय ने संकेत दिया कि लोकतंत्र में राजनीतिक बहस का जवाब अदालत नहीं, बल्कि सार्वजनिक और राजनीतिक मंच पर दिया जाना चाहिए।
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राहत राशि से जांच कैसे प्रभावित होगी?
सुनवाई के दौरान जस्टिस विश्वनाथन ने यह भी पूछा कि सरकार द्वारा पहले से घोषित 10 लाख रुपए की अनुग्रह राशि, अनुकंपा नियुक्ति और अन्य सहायता पीड़ित परिवारों को देने से सीबीआई जांच किस प्रकार प्रभावित होगी। अदालत ने माना कि पीड़ितों को राहत पहुंचाना सरकार का दायित्व है और इसे जांच में हस्तक्षेप नहीं माना जा सकता। बेंच ने DMK से पूछा कि यदि उन्हें किसी बयान पर आपत्ति है तो कानून के तहत अन्य वैधानिक उपाय अपनाए जा सकते हैं।
आखिरकार DMK ने वापस ली याचिका
सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख के बाद DMK की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। अदालत ने अनुमति देते हुए याचिका को वापस लिया हुआ मानकर खारिज कर दिया। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता को किसी बयान या कार्रवाई पर कानूनी आपत्ति है तो वह उपयुक्त कानूनी प्रक्रिया का सहारा ले सकता है।
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करूर भगदड़ की जांच सीबीआई को सौंप चुकी है कोर्ट
गौरतलब है कि करूर भगदड़ की घटना में 41 लोगों की मौत हुई थी। इस दुखद हादसे ने पूरे देश को झकझोर दिया था। पिछले वर्ष 13 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच सुनिश्चित करने के लिए इसकी जांच सीबीआई को सौंप दी थी। साथ ही जांच की निगरानी के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अजय रस्तोगी की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय पर्यवेक्षण समिति भी गठित की गई थी, ताकि जांच पूरी तरह पारदर्शी ढंग से आगे बढ़ सके।












