Meta पर 120 लाख करोड़ रुपए की पेनाल्टी !बच्चों को सोशल मीडिया का आदी बनाने का आरोप

नई दिल्ली। फेसबुक और इंस्टाग्राम की पैरेंट कंपनी मेटा पर अमेरिका के चार राज्यों ने 1.4 ट्रिलियन डॉलर (करीब 120 लाख करोड़ रुपए) की पेनाल्टी लगाने की मांग की है। आरोप है कि कंपनी ने अपने प्लेटफॉर्म को इस तरह डिजाइन किया, जिससे बच्चे और किशोर लंबे समय तक सोशल मीडिया पर बने रहें। इस मामले की सुनवाई अगस्त में कैलिफोर्निया की फेडरल कोर्ट में होगी और इसका असर पूरी टेक इंडस्ट्री पर पड़ सकता है।
बच्चों को सोशल मीडिया का आदी बनाने का आरोप
अमेरिकी राज्यों का आरोप है कि मेटा ने फेसबुक और इंस्टाग्राम के कई फीचर्स जानबूझकर ऐसे तैयार किए, जो बच्चों और किशोरों की स्क्रीन टाइम बढ़ाने के लिए बनाए गए। इसमें लगातार स्क्रॉल होने वाली फीड, नोटिफिकेशन, लाइक सिस्टम, रिकमेंडेशन एल्गोरिदम और अन्य एंगेजमेंट फीचर्स शामिल हैं। राज्यों का दावा है कि कंपनी को इन फीचर्स के संभावित नुकसान की जानकारी थी, लेकिन इसके बावजूद प्लेटफॉर्म को सुरक्षित बताकर पेश किया गया।
रिकॉर्ड पेनाल्टी चार राज्यों की मांग
कैलिफोर्निया, कोलोराडो, केंटकी और न्यू जर्सी ने मेटा के खिलाफ यह मामला दायर किया है। इसके अलावा 14 अन्य राज्यों ने भी कंपनी के खिलाफ अलग-अलग कानूनी कार्रवाई शुरू कर रखी है। मांगी गई 1.4 ट्रिलियन डॉलर की पेनाल्टी टेक इंडस्ट्री के इतिहास की सबसे बड़ी मांग मानी जा रही है। यह रकम मेटा की करीब 1.5 ट्रिलियन डॉलर की मार्केट वैल्यू के लगभग बराबर है।
मानसिक स्वास्थ्य पर असर का दावा
मुकदमे में कहा गया है कि सोशल मीडिया के इन फीचर्स की वजह से कई बच्चों और किशोरों में चिंता, डिप्रेशन, नींद की समस्या और सोशल मीडिया की लत जैसी परेशानियां बढ़ी हैं। इसी आधार पर राज्यों ने कंपनी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है।
भारत में भी नोटिस का सामना कर रही कंपनी
एक अलग मामले में भारत सरकार ने भी इंस्टाग्राम पर कथित चाइल्ड सेक्शुअल कंटेंट से जुड़े आरोपों को लेकर मेटा को नोटिस भेजा है। रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी से इस मामले में जवाब मांगा गया है।
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मेटा ने आरोपों को किया खारिज
मेटा ने सभी आरोपों से इनकार किया है। कंपनी का कहना है कि सोशल मीडिया एडिक्शन को आधिकारिक मानसिक बीमारी नहीं माना गया है। साथ ही उसने दावा किया कि युवाओं की सुरक्षा के लिए कई नए फीचर्स जोड़े गए हैं और 1.4 ट्रिलियन डॉलर की पेनाल्टी की मांग का कोई ठोस कानूनी आधार नहीं है।












