नाबालिगों की पोर्न साइट्स तक पहुंच पर SC सख्त:केंद्र सरकार को नीति बनाने के निर्देश, MP के अधिवक्ता की जनहित याचिका पर हुई सुनवाई

सेंधवा। नाबालिगों की पोर्नोग्राफिक सामग्री तक आसान पहुंच को रोकने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि बच्चों को ऐसी सामग्री से बचाने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाना सरकार और संबंधित मंत्रालयों की जिम्मेदारी है। यह मामला डिजिटल प्लेटफॉर्म के नियमन और नीति निर्माण से जुड़ा है इसलिए इस पर फैसला न्यायपालिका नहीं बल्कि सरकार को लेना होगा।
मध्य प्रदेश के अधिवक्ता की जनहित याचिका पर हुई सुनवाई
मध्य प्रदेश के सेंधवा निवासी सामाजिक कार्यकर्ता और अधिवक्ता बीएल जैन की ओर से दायर जनहित याचिका पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि याचिका में उठाया गया मुद्दा बेहद गंभीर और सार्वजनिक महत्व का है।
सरकार और मंत्रालयों को सुझावों पर विचार करने के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े मामलों में तकनीकी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए नीति बनाना सरकार का काम है। अदालत ने याचिकाकर्ता को अपनी याचिका और सुझाव केंद्र सरकार तथा संबंधित मंत्रालयों के सामने रखने की अनुमति दी है। पीठ ने निर्देश दिया कि सरकार और संबंधित अधिकारी याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए मुद्दों और सुझावों पर कानून के अनुसार उचित विचार करें। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने जनहित याचिका का निपटारा कर दिया।
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बच्चों के मानसिक विकास पर असर का उठाया गया मुद्दा
याचिका में नाबालिगों की पोर्नोग्राफी तक बढ़ती पहुंच को लेकर चिंता जताई गई थी। इसमें कहा गया था कि ऐसी सामग्री बच्चों और किशोरों के मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है। याचिकाकर्ता ने विशेष रूप से 13 से 18 वर्ष के किशोरों पर इसके संभावित मनोवैज्ञानिक प्रभावों का उल्लेख किया। याचिका में कहा गया कि कम उम्र में ऐसी सामग्री तक पहुंच भविष्य में सामाजिक और पारिवारिक समस्याओं को बढ़ावा दे सकती है।
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कई देशों में लागू हैं सख्त नियम
याचिका में यह भी बताया गया कि दुनिया के कई देशों में बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री और ऐसी वेबसाइट्स तक पहुंच रोकने के लिए कड़े नियम लागू हैं। भारत में भी नाबालिगों की सुरक्षा के लिए प्रभावी डिजिटल नियंत्रण व्यवस्था की जरूरत बताई गई। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि इस दिशा में कदम उठाने की जिम्मेदारी सरकार और नीति बनाने वाली संस्थाओं की है। अब केंद्र सरकार को याचिकाकर्ता के सुझावों पर विचार कर आगे की कार्रवाई करनी होगी।












