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सुप्रीम कोर्ट :वकील बोले मस्जिदें सबके लिए, लेकिन नियम अलग; हिजाब आस्था का हिस्सा, हर रिवाज कुरान में दर्ज नहीं

अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार व्यक्तिगत है, न कि केवल संप्रदाय का। उन्होंने धर्मांतरण विरोधी कानूनों का उदाहरण देते हुए कहा कि व्यक्ति को अपने धर्म को मानने और पालन करने का अधिकार सर्वोपरि है।
वकील बोले मस्जिदें सबके लिए, लेकिन नियम अलग; हिजाब आस्था का हिस्सा, हर रिवाज कुरान में दर्ज नहीं

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में केरल के सबरीमाला मंदिर सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश से जुड़े भेदभाव के मुद्दे पर सुनवाई जारी है। आज इस मामले की सुनवाई का नौवां दिन रहा, जिसमें अलग-अलग पक्षों ने अपने तर्क प्रस्तुत किए।मस्जिद और दरगाहों में महिलाओं के प्रवेश का विरोध कर रहे अधिवक्ता निजाम पाशा ने दलील दी कि धार्मिक आस्थाएं और संस्थागत नियम हमेशा एक जैसे नहीं होते।

स्कूल या अन्य संस्थानों के अपने नियम होते हैं

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कोई व्यक्ति हिजाब को धार्मिक रूप से आवश्यक मान सकता है, लेकिन स्कूल या अन्य संस्थाओं के अपने नियम हो सकते हैं। उनका कहना था कि हर धार्मिक स्थल की अपनी मर्यादा होती है, जिसे बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि कुरान में हर प्रथा का विस्तार से उल्लेख नहीं है, लेकिन पैगंबर की परंपराएं भी धार्मिक आचरण का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

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मुस्लिम पर्सनल लॉ बोड ने क्या कहा?

इससे पहले 23 अप्रैल की सुनवाई में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने कोर्ट को बताया था कि इस्लाम महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने से नहीं रोकता, हालांकि घर पर इबादत करना अधिक उपयुक्त माना जाता है। सबरीमाला मंदिर मामले पर 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक लगातार सुनवाई हुई थी। केंद्र सरकार ने महिलाओं के प्रवेश के विरोध में कहा कि देश के कई धार्मिक स्थलों पर परंपराओं के आधार पर पुरुषों के प्रवेश पर भी रोक है, इसलिए धार्मिक मान्यताओं का सम्मान किया जाना चाहिए।

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वकील- हर धार्मिक प्रथा में भेदभाव नहीं किया जा सकता

वहीं, असम के कामाख्या मंदिर की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि हर धार्मिक प्रथा को भेदभाव नहीं कहा जा सकता। उन्होंने बताया कि इस मंदिर में देवी की पूजा योनि रूप में होती है और मासिक धर्म को उत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दौरान मंदिर कुछ समय के लिए बंद रहता है और केवल महिला पुजारियों को ही अंदर जाने की अनुमति होती है। उनका कहना था कि यह तांत्रिक परंपरा स्त्री शक्ति का प्रतीक है।

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अधिवक्ता अश्विनी बोलीं- लोगों को अपने धर्म मानने का अधिकार

अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार व्यक्तिगत है, न कि केवल संप्रदाय का। उन्होंने धर्मांतरण विरोधी कानूनों का उदाहरण देते हुए कहा कि व्यक्ति को अपने धर्म को मानने और पालन करने का अधिकार सर्वोपरि है। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति महादेवन ने एक वकील को मुद्दे से भटकने पर टोका, जबकि मुख्य न्यायाधीश ने समय समाप्त होने की बात कहकर कार्यवाही स्थगित कर दी। एक अन्य वकील ने कहा कि यदि कोई धार्मिक परंपरा क्रूरता की श्रेणी में नहीं आती, तो अदालत को उसमें सीमित हस्तक्षेप करना चाहिए।

मामले में अगली सुनवाई में भी विभिन्न पक्षों के तर्क जारी रहने की संभावना है, और यह बहस धार्मिक स्वतंत्रता बनाम समानता के अधिकार के बीच संतुलन पर केंद्रित बनी हुई है।

Aakash Waghmare
By Aakash Waghmare

आकाश वाघमारे | MCU, भोपाल से स्नातक और फिर मास्टर्स | मल्टीमीडिया प्रोड्यूसर के तौर पर 3 वर्षों का क...Read More

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