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सबरीमाला सुनवाई:धर्म में भी व्यवस्था जरूरी, बिना नियम नहीं चल सकता सिस्टम

सुप्रीम कोर्ट यह समझने की कोशिश कर रहा है कि क्या धर्म के नाम पर महिलाओं के साथ अलग व्यवहार सही है या नहीं। यह सुनवाई तय करेगी कि महिलाओं को पूजा और धर्म में बराबरी का हक कैसे मिले और उनकी इज्जत व अधिकार को संविधान के हिसाब से कैसे मजबूत बनाया जाए।
धर्म में भी व्यवस्था जरूरी, बिना नियम नहीं चल सकता सिस्टम
Sabarimala Mandir

नई दिल्ली। भारत में महिलाओं के अधिकारों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। मामला सिर्फ केरल के सबरीमाला मंदिर तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अब यह पूरे देश में धर्म और संविधान के बीच संतुलन को समझने का मुद्दा बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ इस समय ऐसे सवालों पर विचार कर रही है, जो आने वाले समय में महिलाओं की स्थिति को बदल सकते हैं। अदालत यह तय करने की कोशिश कर रही है कि धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा क्या होनी चाहिए और क्या इस स्वतंत्रता के नाम पर महिलाओं के साथ भेदभाव किया जा सकता है। इसका असर सिर्फ एक मंदिर या एक धर्म तक नहीं रहेगा, बल्कि अलग अलग समुदायों में महिलाओं के अधिकारों पर भी पड़ेगा।

सिर्फ सबरीमाला नहीं पूरे देश का मामला

पहले यह विवाद सिर्फ सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर था, लेकिन अब यह बहस कहीं ज्यादा बड़ी हो चुकी है। अदालत जिन मुद्दों पर विचार कर रही है, उनमें कई धार्मिक परंपराएं शामिल हैं, जहां महिलाओं के साथ अलग व्यवहार किया जाता है। कुछ समुदायों में महिलाओं को धार्मिक स्थानों में जाने की अनुमति नहीं होती, तो कहीं उन्हें नेतृत्व की भूमिका से दूर रखा जाता है। इसके अलावा, ऐसे भी मामले हैं जहां महिलाओं को शादी या अन्य सामाजिक कारणों के चलते अपने ही समुदाय में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर एक स्पष्ट दिशा तय करना चाहता है।

धर्म की आजादी बनाम महिलाओं की बराबरी

भारत का संविधान हर व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने की आजादी देता है। लेकिन इसके साथ ही यह भी कहता है कि सभी नागरिकों को समान अधिकार मिलना चाहिए। अब सवाल यह है कि जब ये दोनों बातें आपस में टकराती हैं, तो किसे प्राथमिकता दी जाए। धार्मिक संस्थाएं अक्सर यह कहती हैं कि उन्हें अपने नियम खुद बनाने का अधिकार है। वहीं दूसरी ओर महिलाएं यह मांग करती हैं कि अगर कोई नियम उनके साथ भेदभाव करता है, तो उसे खत्म किया जाना चाहिए। यही टकराव आज सुप्रीम कोर्ट के सामने है।

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कोई नियम या व्यवस्था न हो

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण बात कही। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी धार्मिक संस्था को अपने प्रबंधन का अधिकार जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वहां कोई नियम या व्यवस्था ही न हो।  अदालत ने कहा कि मंदिर, मस्जिद या दरगाह जैसी जगहों पर कामकाज के लिए एक तय ढांचा होना चाहिए। हर व्यक्ति अपनी मर्जी से नियम नहीं बना सकता। साथ ही कहा कि कोई भी व्यवस्था संविधान के खिलाफ नहीं हो सकती और उसमें भेदभाव की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत धार्मिक स्वतंत्रता को पूरी तरह खुला नहीं छोड़ना चाहती बल्कि उसे संवैधानिक सीमाओं के भीतर रखना चाहती है।

धार्मिक प्रथाओं से रखा जाता है बाहर

इस सुनवाई में कई ऐसे मुद्दे भी सामने आए हैं, जो सीधे तौर पर महिलाओं के अधिकारों से जुड़े हैं। जैसे कुछ समुदायों में महिलाओं को धार्मिक प्रथाओं से बाहर रखा जाता है या उनके साथ अलग नियम लागू किए जाते हैं। इसके अलावा, पर्सनल लॉ से जुड़े कई ऐसे पहलू हैं, जहां महिलाओं को बराबरी का अधिकार नहीं मिलता। जैसे बहुविवाह की अनुमति या कुछ परंपराएं, जो महिलाओं को सीमित करती हैं। सुप्रीम कोर्ट अब यह तय करेगा कि क्या ऐसी प्रथाएं संविधान के अनुरूप हैं या नहीं।

2018 का फैसला और उसके बाद की बहस

सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। इसमें 10 से 50 साल की महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश पर लगी रोक को हटाया गया था। अदालत ने इसे असंवैधानिक बताया था लेकिन इस फैसले के बाद देशभर में बहस शुरू हो गई और कई लोगों ने इसका विरोध भी किया। इसके बाद इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गईं, जिन पर अब बड़ी पीठ सुनवाई कर रही है।

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Aditi Rawat
By Aditi Rawat

अदिति रावत | MCU, भोपाल से M.Sc.(न्यू मीडिया टेक्नॉलजी)| एंकर, न्यूज़ एक्ज़िक्यूटिव की जिम्मेदारियों...

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