सोहागपुर से जुड़ी है महात्मा गांधी की ऐतिहासिक यात्रा, माखनलाल चतुर्वेदी से मिलने दो बार आए थे बापू
सोहागपुर। गांधीजी की इस ऐतिहासिक यात्रा में सोहागपुर रेलवे स्टेशन की महत्वपूर्ण भूमिका रही, जहां वे रेल से उतरकर कार द्वारा बाबई के लिए रवाना हुए। 30 दिसंबर 1933 और 7 जनवरी 1934 को सोहागपुर पहुंचे गांधीजी ने बाबई में माखनलाल चतुर्वेदी और स्थानीय लोगों से मुलाकात की। आज गांधी जयंती पर सोहागपुर से जुड़े इस ऐतिहासिक प्रसंग में स्वतंत्रता आंदोलन के दो महान व्यक्तित्वों के संबंध की स्मृति फिर जीवंत हो उठती है।
1933 में पहली बार सोहागपुर पहुंचे गांधीजी
वर्ष 1933 में जेल से रिहा होने के बाद महात्मा गांधी ने अस्पृश्यता उन्मूलन और अछूतोद्धार के उद्देश्य से देशव्यापी यात्रा शुरू की थी। इसी अभियान के दौरान 30 दिसंबर 1933 को वे सोहागपुर पहुंचे और यहां से कार द्वारा तत्कालीन बाबई के लिए रवाना हुए। बाबई, जो माखनलाल चतुर्वेदी की जन्मभूमि थी, गांधीजी की यात्रा का प्रमुख केंद्र रहा।
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7 जनवरी 1934 को फिर पहुंचे सोहागपुर
महात्मा गांधी दूसरी बार 7 जनवरी 1934 को जबलपुर से रेल द्वारा सोहागपुर पहुंचे। रेलवे स्टेशन से वे कार द्वारा बाबई पहुंचे, जहां उनका अभूतपूर्व स्वागत किया गया। स्वागत समारोह की अध्यक्षता बाबूलाल डेरिया ने की और उन्होंने गांधीजी को अभिनंदन पत्र और थैली भेंट की।
बाबई में माखनलाल चतुर्वेदी से जुड़ा आत्मीय रिश्ता
बाबई में अपने संबोधन में गांधीजी ने क्षेत्र के प्रति अपने आत्मीय लगाव को व्यक्त किया था। उन्होंने कहा था, भाई मक्खनलाल की जन्मभूमि को प्रणाम करने आया हूं। आप लोगों के स्थान को देखने के लिए मेरा मन बाबई में लगा हुआ था। गांधीजी ने यह भी कहा था, मैं यहां पैसा लेने नहीं आया हूं। मैं तो आप भाइयों के प्रेम की खातिर आया हूं।
सोहागपुर बना ऐतिहासिक यात्रा का पड़ाव
बाबई से लौटने के बाद गांधीजी ने सोहागपुर में रात्रि विश्राम किया और अगले दिन हरदा के लिए रवाना हुए। इस तरह सोहागपुर गांधीजी की यात्रा का अंतिम गंतव्य भले ही नहीं था, लेकिन बाबई प्रवास का महत्वपूर्ण पड़ाव जरूर बना। सोहागपुर रेलवे स्टेशन से जुड़ा यह प्रसंग आज भी उस ऐतिहासिक यात्रा की याद दिलाता है।
आज भी तस्वीरों में जीवित है गांधीजी की स्मृति
गांधी जयंती के अवसर पर सोहागपुर से जुड़ा यह इतिहास एक बार फिर सामने आता है। तस्वीरों में वह जालीदार कमरा भी है, जहां सोहागपुर के एक घर में बापू ठहरे थे, साथ ही माखनलाल चतुर्वेदी दादा का चित्र और वह गली भी है, जहां दादा का घर था। सोहागपुर के लिए यह केवल ऐतिहासिक यात्रा नहीं, बल्कि महात्मा गांधी और माखनलाल चतुर्वेदी के संबंध की स्मृति से जुड़ा गौरवपूर्ण प्रसंग है।
























