क्या है पूरी कानूनी प्रक्रिया:क्या सच में इतना आसान है राज्य का नाम बदलना?

किसी राज्य का नाम बदलना सिर्फ एक सरकारी घोषणा नहीं होता, बल्कि यह पूरी संवैधानिक प्रक्रिया से गुजरता है। सबसे पहले राज्य की विधानसभा में प्रस्ताव पारित किया जाता है, फिर केंद्र सरकार उसे राष्ट्रपति के पास भेजती है।
क्या सच में इतना आसान है राज्य का नाम बदलना?
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AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    भारत में कई राज्यों के नाम आजादी के बाद बदले जा चुके हैं। राज्य का नाम बदलना सुनने में छोटा फैसला लगता है, लेकिन असल में यह पूरी व्यवस्था को रीसेट करने जैसा होता है। अब जब केरल को ‘केरलम’ करने की मंजूरी मिल चुकी है, तो चर्चा सिर्फ नाम की नहीं, बल्कि इसके पीछे बड़ा खर्च और लंबी कानूनी प्रक्रिया की भी है? नाम बदलते ही कहां-कहां लगता है पैसा?

    नाम बदलने की कानूनी प्रक्रिया क्या है?

    भारत में किसी भी राज्य का नाम बदलना संविधान के तहत तय प्रक्रिया से ही संभव है।

    • विधानसभा का प्रस्ताव- सबसे पहले संबंधित राज्य की विधानसभा में नाम बदलने का प्रस्ताव पारित किया जाता है। इसके बाद यह प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा जाता है।
    • राष्ट्रपति की सिफारिश- केंद्र सरकार प्रस्ताव को राष्ट्रपति के पास भेजती है। उनकी सिफारिश के बाद आगे की प्रक्रिया शुरू होती है।
    • संसद में विधेयक- संसद में बिल पेश किया जाता है। इसे लोकसभा और राज्यसभा दोनों में साधारण बहुमत से पारित करना जरूरी होता है।
    • राजपत्र में अधिसूचना- दोनों सदनों से पास होने और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद राजपत्र में अधिसूचना जारी होती है। इसके बाद नया नाम आधिकारिक रूप से लागू हो जाता है।

    नाम बदलते ही कहां-कहां लगता है पैसा?

    राज्य का नाम बदलना मतलब सरकार के हर स्तर पर बदलाव। यह काम दिखने में सरल, लेकिन असल में काफी बड़ा होता है।

    • सरकारी रिकॉर्ड और स्टेशनरी- मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर जिला और पंचायत स्तर तक हर जगह की मुहर, सील, लेटरहेड, फाइलें और आधिकारिक दस्तावेज बदलने पड़ते हैं। लाखों कागजों में नया नाम दर्ज करना पड़ता है।
    • साइनबोर्ड और सार्वजनिक स्थान- हाईवे, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, सरकारी इमारतें इन सभी जगहों पर लगे बोर्ड बदलने होते हैं। बड़े राज्यों में यह सबसे महंगा हिस्सा साबित होता है।
    • डिजिटल अपडेट- सरकारी वेबसाइट, ऑनलाइन पोर्टल, डेटाबेस और डिजिटल रिकॉर्ड सब कुछ अपडेट करना पड़ता है। तकनीकी टीम, समय और संसाधनों की जरूरत होती है।
    • नागरिकों के दस्तावेज- वोटर आईडी, स्कूल-कॉलेज की मार्कशीट, सरकारी प्रमाण पत्र इन पर भी धीरे-धीरे असर पड़ता है। हालांकि पुराने दस्तावेज तुरंत रद्द नहीं होते, लेकिन नए दस्तावेज नए नाम से जारी होते हैं।

    खर्च कौन उठाता है?

    ज्यादातर खर्च राज्य सरकार को उठाना पड़ता है, क्योंकि नाम बदलने का प्रस्ताव वही लाती है। सरकारी दफ्तरों की सील, स्टैम्प, लेटरहेड, राज्य सड़कों के बोर्ड, वेबसाइट और पोर्टल अपडेट का खर्च राज्य सरकार वहन करती है। कुछ खर्च केंद्र सरकार के हिस्से में आता है। जैसे रेलवे स्टेशनों के बोर्ड, टिकट, टाइम-टेबल, पोस्ट ऑफिस रिकॉर्ड और नेशनल हाईवे के साइनबोर्ड। कुल मिलाकर 80 से 90 प्रतिशत आर्थिक बोझ राज्य सरकार पर ही पड़ता है।

    कितने राज्यों के बदले नाम

    1. मद्रास राज्य- तमिलनाडु
    पुराना नाम: मद्रास राज्य
    नया नाम: तमिलनाडु
    साल: 1969

    2. मैसूर- कर्नाटक
    पुराना नाम: मैसूर
    नया नाम: कर्नाटक
    साल: 1973

    3. उड़ीसा- ओडिशा
    पुराना नाम: उड़ीसा (Orissa)
    नया नाम: ओडिशा (Odisha)
    साल: 2011

    4. उत्तरांचल- उत्तराखंड
    पुराना नाम: उत्तरांचल
    नया नाम: उत्तराखंड
    साल: 2007

    5. पश्चिम बंगाल- पश्चिम बांग्ला
    पुराना नाम: पश्चिम बंगाल
    प्रस्तावित नाम: पश्चिम बांग्ला

    6. केरल- केरलम (प्रक्रिया जारी)
    पुराना नाम: केरल
    प्रस्तावित नाम: केरलम

    Garima Vishwakarma
    By Garima Vishwakarma

    गरिमा विश्वकर्मा | People’s Institute of Media Studies से B.Sc. Electronic Media की डिग्री | पत्रकार...Read More

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