भारत में कई राज्यों के नाम आजादी के बाद बदले जा चुके हैं। राज्य का नाम बदलना सुनने में छोटा फैसला लगता है, लेकिन असल में यह पूरी व्यवस्था को रीसेट करने जैसा होता है। अब जब केरल को ‘केरलम’ करने की मंजूरी मिल चुकी है, तो चर्चा सिर्फ नाम की नहीं, बल्कि इसके पीछे बड़ा खर्च और लंबी कानूनी प्रक्रिया की भी है? नाम बदलते ही कहां-कहां लगता है पैसा?
भारत में किसी भी राज्य का नाम बदलना संविधान के तहत तय प्रक्रिया से ही संभव है।
राज्य का नाम बदलना मतलब सरकार के हर स्तर पर बदलाव। यह काम दिखने में सरल, लेकिन असल में काफी बड़ा होता है।
ज्यादातर खर्च राज्य सरकार को उठाना पड़ता है, क्योंकि नाम बदलने का प्रस्ताव वही लाती है। सरकारी दफ्तरों की सील, स्टैम्प, लेटरहेड, राज्य सड़कों के बोर्ड, वेबसाइट और पोर्टल अपडेट का खर्च राज्य सरकार वहन करती है। कुछ खर्च केंद्र सरकार के हिस्से में आता है। जैसे रेलवे स्टेशनों के बोर्ड, टिकट, टाइम-टेबल, पोस्ट ऑफिस रिकॉर्ड और नेशनल हाईवे के साइनबोर्ड। कुल मिलाकर 80 से 90 प्रतिशत आर्थिक बोझ राज्य सरकार पर ही पड़ता है।
1. मद्रास राज्य- तमिलनाडु
पुराना नाम: मद्रास राज्य
नया नाम: तमिलनाडु
साल: 1969
2. मैसूर- कर्नाटक
पुराना नाम: मैसूर
नया नाम: कर्नाटक
साल: 1973
3. उड़ीसा- ओडिशा
पुराना नाम: उड़ीसा (Orissa)
नया नाम: ओडिशा (Odisha)
साल: 2011
4. उत्तरांचल- उत्तराखंड
पुराना नाम: उत्तरांचल
नया नाम: उत्तराखंड
साल: 2007
5. पश्चिम बंगाल- पश्चिम बांग्ला
पुराना नाम: पश्चिम बंगाल
प्रस्तावित नाम: पश्चिम बांग्ला
6. केरल- केरलम (प्रक्रिया जारी)
पुराना नाम: केरल
प्रस्तावित नाम: केरलम