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शहर के अलग-अलग इलाकों में 40 से 80 फीसदी तक बढ़ीं गौरैया

वर्ल्ड स्पैरो डे : बिशनखेड़ी, कोलार, इंद्रपुरी आदि जगहों पर संख्या में आया सुधार
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शहर के अलग-अलग इलाकों में 40 से 80 फीसदी तक बढ़ीं गौरैया

गौरैया विश्व के अधिकांश हिस्सों में रहती हैं। यह मनुष्यों से लगभग 10,000 वर्ष पूर्व से जुड़ी हुई हैं। भारत में नए घरों में गौरैया के घोंसले बनाना शुभ माना जाता है। यह लगभग 16 सेमी आकार का छोटा सा पक्षी है, जो मनुष्य के लिए भी जरूरी है। यह सड़ा हुआ बीज, अनाज और लार्वा को खाकर प्रभावी कीट नियंत्रक साबित हुई है। भोपाल बर्ड्स एवं मप्र राज्य जैव विविधता बोर्ड के साथ मिलकर भोपाल बर्ड्स जैसे संगठन इस दिशा में कार्य कर रहे हैं। वर्ष 2024 की गणना अनुसार, भेल, टीटी नगर, पुराना भोपाल आदि क्षेत्रों में गौरैया पक्षी की आबादी में 40 फीसदी की वृद्धि देखी गई, जबकि कोलार, इंद्रपुरी, भेल आदि क्षेत्रों में 60 फीसदी की वृद्धि देखी गई है। करोंद, बिलखिरिया, बिशनखेड़ी, खजूरी जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में 80 फीसदी तक वृद्धि देखी गई है। लोग दाना-पानी व सकोरे लोग अपने घरों में रखने लगे हैं, जिसके कारण संख्या में सुधार आ रहा है।

गौरैया पर आज से लगेगी फोटो एग्जीबिशन

वर्ल्ड स्पैरो डे के मौके पर क्षेत्रीय प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय में भोपाल बर्ड्स कंजर्वेशन सोसाइटी द्वारा फोटोग्राफी एग्जीबिशन का आयोजन किया जा रहा है। इस प्रदर्शनी का शुभारंभ 20 मार्च को दोपहर 12.15 मिनट पर होगा। प्रदर्शनी में पूरे भारत से फोटोग्राफर्स ने गौरैया के अलग- अलग मूड के 150 से ज्यादा फोटोज भेजे थे, जिसमें से 30 से 35 फोटोज का सिलेक्शन प्रदर्शनी के लिए किया गया है। यह प्रदर्शनी पूरे एक माह चलेगी।

शहरवासियों की जागरुकता से बढ़ रहीं गौरैया

पिछले साल किए सर्वे में कई जगहों पर गौरैया की तादात बढ़ी हुई दिखी। हम कॉलेजों में बर्ड नेस्ट बनाना सिखाते हैं ताकि लोग अपने घरों में पेड़ों व बालकनी में इन्हें लगाकर गौरैया का सुरक्षित स्थान प्रदान करें। जूतों के खाली डिब्बों से भी घोंसला बनाया जा सकता है। शहर के मंदिरों व हरियाली वाले इलाकों में इन्हें लगाया जाता है। साथ ही लोगों से दाना-पानी रखने की अपील की जाती है, जिसका भोपाल में काफी असर नजर आता है। - मो. खालिक, पक्षी विशेषज्ञ

मिट्टी वाली जगह गौरैया के बच्चों के लिए जरूरी

वयस्क गौरैया मुख्यत: अनाज या घास के दाने खाती है परंतु उसके बच्चे केवल कीटों का लार्वा ही खा सकते हैं। घरेलू गौरैया बहुत ही सामाजिक पक्षी है। यह सभी मौसमों में झुंडों में रहती हैं तथा एक साथ धूल स्नान या समूह गायन करती दिखाई देती हैं, इसलिए घर के आसपास मिट्टी वाली जगह भी छोड़ें। सड़कों के किनारे पूरी तरह से सीमेंट में परिवर्तित न करके पेड़ों के आसपास मिट्टी छोड़ दें ताकि नमी से उन्हें भोजन मिल सके। पराग कण, पौधों के लिए एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जो गौरैया द्वारा भी की जाती है क्योंकि वे अपने भोजन की खोज के दौरान पौधों के फूलों पर भी जाती हैं और पराग कणों को स्थानांतरित करने में भी अप्रत्यक्ष रूप से मदद करती हैं। गौरैया को हाउस स्पैरो कहा जाता है क्योंकि यह मनुष्य के आसपास रहना पसंद करती हैं। इन्हें सही रहवास मिले इसके लिए छायादार जगह पर गर्मी में पानी के सकोरे लगाएं। दाना भी छायादार जगह में रखें। - डॉ. संगीता राजगीर, एक्सपर्ट, भोपाल बर्ड्स

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