प्रवीण श्रीवास्तव, भोपाल। मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध का असर अब दवाओं पर भी पड़ने लगा है। केन्द्र सरकार 1 अप्रैल से एलोपैथिक दवाओं की कीमतों में करीब 0.65 फीसदी तक बढ़ोतरी कर रही है। ये वे दवाएं हैं जो रोजमर्रा के यूज की हैं। फार्मा कंपनियों के अनुसार, ईरान और खाड़ी देशों से आयुर्वेदिक व यूनानी दवाओं के साथ-साथ एपीआई (एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडिएंट ) यानी दवाओं के मुख्य कच्चे रसायन भी बड़ी मात्रा में आयात किए जाते हैं।
वहीं, कुछ महत्वपूर्ण एलोपैथिक दवाओं के इंटरमीडिएट्स इजराइल के रास्ते भारत पहुंचते हैं। युद्ध से इन एपीआई की सप्लाई प्रभावित हुई है, जिससे मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट 40 फीसदी तक बढ़ गई है। कई कंटेनर बीच समुद्र में फंसे हुए हैं या देरी से पहुंच रहे हैं, जिससे दवाओं की उपलब्धता प्रभावित हो रही है। निर्यात भी प्रभावित हो रहा है, जबकि भारत दुनिया के कई देशों को बड़ी मात्रा में दवाएं सप्लाई करता है। हालांकि दवा उद्योगों से जुड़े विशषेज्ञों का मानना है कि हमारे लिए सरकार द्वारा दी गई 0.65 फीसदी की राहत काफी नहीं है। वे चाहते हैं दवाओं के दाम में 20 से 35 फीसदी तक इजाफा होना चाहिए।
एपीआई वह मुख्य तत्व होता है, जिससे दवा असर करती है। अगर इसकी सप्लाई प्रभावित होती है, तो दवा बनाना महंगा और मुश्किल दोनों हो जाता है। भारत एपीआई के लिए कई देशों पर निर्भर है।
स्माल एंड मीडियम ड्रग मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन ने सरकार और केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव को पत्र लिखकर बदली परिस्थितियों के हिसाब से नीतियों को बदलने की मांग रखी है। एमपी स्मॉल एंड मीडियम ड्रग मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. दर्शन कटारिया ने ने कहा है कि यदि सरकार ने राहत नहीं दी तो दो-तीन महीनों में बड़ी संख्या में दवा निर्माण कर रही इकाइयां बंद हो सकती हैं।
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फार्मा कंपनियों के अनुसार बदली परिस्थितियों में पैकेजिंग व अन्य सामग्री भी सिर्फ नकद भुगतान पर ही मिल रही है। जबकि सरकार को आपूर्ति के बाद महीनों तक भी दवा उद्योगों को भुगतान प्राप्त नहीं होता।
कच्चा माल महंगा, पैकेजिंग की कीमत भी बढ़ी
बहुत सारे जरूरी कच्चे माल, केमिकल कंपोनेंट्स, प्लास्टिक और एलुमिनियम की कीमतों में तेजी आई है, जिसका असर दवा कंपनियों की लागत पर पड़ रहा है। क्योंकि टैबलेट और सिरप के निर्माण के साथ-साथ उनकी पैकेजिंग में भी प्लास्टिक और एलुमिनियम का बड़ा उपयोग होता है।
सिर्फ कच्चा माल ही नहीं एलपीजी संकट भी दवा उद्योगों के लिए परेशानी खड़ी कर रहा है। गैस की कमी से सबसे ज्यादा असर इंजेक्शन के इम्पूल बनाने वाली कंपनियों पर हुआ है। प्रदेश में पांच कंपनियां है जिसमें से तीन फिलहाल बंद है। दरअसल इम्पूल बनाने के लिए एलपीजी की जरूरत होती है।
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रॉ मटीरियल महंगा हो गया है। दवाओं का ज्यादातर कच्चा माल यानी एक्टिब इंडेग्रेडियंस चाइना से आता है, इसके साथ डोमेस्टिक मार्केट भी स्ट्रॉंग हो गया है। लेकिन पेट्रोलियम सॉल्वेंट, आइसाप्रोपाइल अल्कोहल के दाम 20 से 30 फीसदी तक बढ़े हैं। इससे प्रॉडक्शन कॉस्ट भी बढ़ी है। एक्सपोर्ट पर भी असर हुआ है, कई कंटेनर समुद्र में अटके हुए हैं।
आरएस गोस्वामी, मेडिसिन एक्सपोर्टर
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रॉ मटीरियल के दाम बढ़े हैं। इंडिया से 190 देशों में दवाएं एक्सपोर्ट की जाती हैं। शिप अटके हुए हैं, कंटेनर के रेट भी बढ़ गए हैं। सरकार को लेटर लिखा था कि दवाओं के दाम बढ़ाए जाएंगे। हालांकि सरकार ने दवाओं में अभी 0.64 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की है। छोटे और मंजोले उद्योगों को ज्यादा दिक्कत होगी।
हिमांशु शाह, मेन्युफैक्चरर
जब से लड़ाई शुरू हुई है, तब से हालात बिगड़े हुए हैं। हर्बल और यूनानी के तत्व (कच्चा माल) नहीं आ रहा। प्रोडक्शन चार्ज भी करीब 40 फीसदी तक बढ़ गया है। इरान से केसर समेत कई प्रॉडक्ट आते हैं। पैकेजिंग महंगी हो गई है। अभी तो पाइपलाइन में रखे सामान से काम चल रहा है। युद्ध लंबा चला तो दवाओं की शॉर्टेज और कीमते बढ़ना तय है।
वैद्य रमेश महेश्वरी, संचालक, जमना हर्बल रिसर्च
मप्र का ऐलोपैथिक बाजार- 40 हजार करोड़ सालाना
कहां से क्या आता है
यूनानी/हर्बल कच्चा माल : ईरान, खाड़ी देश, अफगानिस्तान, नेपाल
एलोपैथिक (एपीआई/केमिकल) : चीन, अमेरिका, जर्मनी
स्पेशल जड़ी-बूटियां/मसाले : श्रीलंका, नेपाल
टेक्नोलॉजी रिसर्च : इजराइल
75 प्रतिशत कच्चा माल विदेश से आता है
कच्चे माल की कीमतें 30 से 70 प्रतिशत तक बढ़ी हैं।
190 देशों भारत से एक्सपोर्ट होती हैं दवाइयां।
यह हुआ बदलाव
रॉ मटेरियल 200 परसेंट तक बढ़ी
कंटेनर रेट 30 से 40 परसेंट तक बढ़े
पेट्रोलियम सॉल्वेंट 20 परसेंट
आइसोप्रोपाइल अल्कोहल 25 परसेंट